बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 1023, कुल 1402 में से
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ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ १००९
| शाङ्करभाष्यम् | भाष्यार्थ |
|---|---|
| अतो भूमा, भूमत्वादमृतः; इतरे तद्विपरीताः । | सुनता है; इसलिये वह भूमा है और भूमा होनेके कारण अमृत है। अन्य आनन्द उससे विपरीत [ अर्थात् नाशवान् ] हैं। |
| अत्र च श्रोत्रियत्वावृजिनत्वे तुल्ये, अकामहतत्वकृतो विशेष आनन्दशतगुणवृद्धिहेतुः । अत्रैतानि साधनानि श्रोत्रियत्वावृजिनत्वाकामहतत्वानि तस्य तस्यानन्दस्य प्राप्तावर्थादभिहितानि; यथा कर्माण्यग्निहोत्रादीनि देवानां देवत्वप्राप्तौ । तत्र च श्रोत्रियत्वावृजिनत्वलक्षणे कर्मणी अधरभूमिष्वपि समाने इति न उत्तरानन्दप्राप्तिसाधने अभ्युपेयेते । अकामहतत्वं तु वैराग्यतारतम्योपपत्तेरुत्तरोत्तरभूम्यानन्दप्राप्तिसाधनमित्यवगम्यते । स एष परम आनन्दो वितृष्णश्रोत्रियप्रत्यक्षोऽधिगतः । तथा च वेदव्यासः---"यच्च कामसुखं लोके यच्च दिव्यं महत् सुखम् । तृष्णाक्षयसुखस्यैते नार्हतः षोडशीं कलाम्" इति । | यहाँ [ भिन्न-भिन्न पर्यायोंमें ] श्रोत्रियत्व और निष्पापत्व तो समान हैं, किंतु अकामहतत्वके कारण जो विशेषता है, वही आनन्दकी सौगुनी वृद्धिका कारण है। जिस प्रकार अग्निहोत्रादि कर्म देवताओंके देवत्वकी प्राप्तिके कारण हैं, उसी प्रकार यहाँ ये श्रोत्रियत्व, अवृजिनत्व और अकामहतत्व उस-उस आनन्दकी प्राप्तिमें साधन हैं—यह बात अर्थतः कह दी गयी। इनमें श्रोत्रियत्व और अवृजिनत्वरूप कर्म तो निम्नभूमियोंमें भी समान हैं, इसलिये वे आगेके आनन्दोंकी प्राप्तिमें हेतु नहीं माने जाते, किंतु अकामहतत्व तो वैराग्यका तारतम्य हो सकनेके कारण आगे-आगेकी भूमियोंके आनन्दोंकी प्राप्तिका साधन है—ऐसा ज्ञात होता है। वही तृष्णाहीन श्रोत्रियको प्रत्यक्ष होनेवाला परम आनन्द है—ऐसा ज्ञात होता है। ऐसा ही व्यासजी भी कहते हैं—"लोकमें जो भी कामजनित सुख है और जो दिव्य महान् सुख है, ये तृष्णाक्षयजनित सुखके सोलहवें अंशके समान भी नहीं हैं।" |
बृ० उ० ६४—