भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 1024, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 1024
१०१०बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ४
एष ब्रह्मलोको हे सम्राडिति होवाच याज्ञवल्क्यः । सोऽहमेवमनुशिष्टो भगवते तुभ्यं सहस्रं ददामि गवाम् । अत ऊर्ध्वं विमोक्षायैव ब्रूहीति व्याख्यातमेतत् ।'हे सम्राट् ! यह ब्रह्मलोक है' ऐसा याज्ञवल्क्यने कहा । [ जनक बोले-] 'इस प्रकार उपदेश किया हुआ मैं श्रीमान्को-आपको सहस्र गौएँ देता हूँ। अब आगे मोक्षके लिये ही कहिये।' इस प्रकार इसकी पहले व्याख्या की जा चुकी है।
अत्र ह विमोक्षायेत्यस्मिन् वाक्ये याज्ञवल्क्यो बिभयाञ्चकार भीतवान् । याज्ञवल्क्यस्य भयकारणमाह श्रुतिः—न याज्ञवल्क्यो वक्तृत्वसामर्थ्याभावाद् भीतवानज्ञानाद् वा । किं तर्हि ? मेधावी राजा सर्वेभ्यो मा मामन्तेभ्यः प्रश्ननिर्णयावसानेभ्य उदरौत्सीदावृणोदवरोधं कृतवानित्यर्थः । यद् यन्मया निर्णीतं प्रश्नरूपं विमोक्षार्थं तत्तदेकदेशत्वेनैव कामप्रश्नस्य गृहीत्वा पुनः पुनर्मां पर्यनुयुङ्क्त एव, मेधावित्वादिति । एतद् भयकारणम्—सर्वं मदीयं विज्ञानं कामप्रश्नव्याजेनोपादित्सतीति ॥ ३३ ॥यहाँ 'मोक्षके लिये ही कहिये' इस वाक्यके कहनेपर याज्ञवल्क्यजी डर गये। श्रुति याज्ञवल्क्यजीके भयका कारण बतलाती है-याज्ञवल्क्यजी बोलनेका सामर्थ्य न रहनेसे अथवा अज्ञानवश नहीं डरे। तो फिर क्या बात थी ? इसलिये कि इस मेधावी राजाने मुझे सभी अन्तोंके लिये-प्रश्ननिर्णयोंके लिये उदरौत्सीत्-आवृत कर दिया अर्थात् रोक लिया। मैंने मोक्षके लिये जिस-जिस प्रश्नका निर्णय किया है, उसे यह मेधावी होनेके कारण कामप्रश्नके एकदेशरूपसे ग्रहण करके फिर भी प्रश्न किये ही जाता है। उनके भयका यही हेतु है कि कामप्रश्नके मिषसे ही यह तो मेरा सारा विज्ञान ले लेना चाहता है ॥ ३३ ॥