बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 1025, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 1025
ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०११
सम्बन्ध-भाष्य
| संस्कृत | हिन्दी |
|---|---|
| अत्र विज्ञानमयः स्वयंज्योतिरात्मा स्वप्ने प्रदर्शितः । स्वप्नान्तबुद्धान्तसंचारेण कार्यकारणव्यतिरिक्तता । कामकर्मप्रविवेकश्चासङ्गतया महामत्स्यदृष्टान्तेन प्रदर्शितः । पुनश्चाविद्याकार्यं स्वप्न एव घ्नन्तीवेत्यादिना प्रदर्शितम् । अर्थादविद्यायाः सतत्त्वं निर्धारितम्—अतद्धर्माध्यारोपणरूपत्वमनात्मधर्मत्वं च । | यहाँ स्वप्नमें विज्ञानमय आत्माको स्वयंज्योति दिखाया गया है। स्वप्नस्थान और जागरितस्थानमें संचारके द्वारा उसकी देह और इन्द्रियोंसे भिन्नता दिखायी गयी तथा महामत्स्यके दृष्टान्तसे असङ्गताके कारण उसका काम और कर्मोंसे पार्थक्य भी प्रदर्शित किया गया है। फिर ‘घ्नन्तीव’ इत्यादि वाक्यसे यह दिखाया गया है कि अविद्याका कार्य स्वप्न ही है। इससे स्वतः ही आत्मापर अनात्मधर्मोंका आरोप करना तथा अनात्मधर्म होना अविद्याका स्वरूप दिखलाया गया। |
| तथा विद्यायाश्च कार्यं प्रदर्शितं सर्वात्मभावः स्वप्न एव प्रत्यक्षतः ‘सर्वोऽस्मीति मन्यते सोऽस्य परमो लोकः’ इति । तत्र च सर्वात्मभावः स्वभावोऽस्य, एवम् अविद्याकामकर्मार्दिसर्वसंसारधर्मसम्बन्धातीतं रूपमस्य साक्षात् सुषुप्ते गृह्यते इत्येतद् विज्ञापितम् । | इसी तरह ‘मैं सर्व हूँ—ऐसा मानता है, वह इसका परमलोक है’ इस वाक्यद्वारा प्रत्यक्षतः स्वप्नमें ही सर्वात्मभाव विद्याका कार्य दिखलाया गया। वहाँ सर्वात्मभाव इसका स्वभाव है, इस प्रकार यह सूचित किया गया कि सुषुप्तावस्थामें इस आत्माका अविद्या, काम और कर्मादि सम्पूर्ण सांसारिक धर्मोंके सम्बन्धसे अतीत रूप प्रत्यक्ष ग्रहण किया जाता है। |
| स्वयंज्योतिरात्मा, एष परम आनन्दः; एष विद्याया विषयः; स एष परमः सम्प्रसादः सुखस्य | आत्मा स्वयंप्रकाश है, यह परम आनन्दस्वरूप है; यह विद्याका विषय है; वह यह आत्मा ही परम |