बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 1026, कुल 1402 में से
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१०१२ बृहदारण्यकोपनिषद् [अध्याय ४]
| Sanskrit | Hindi |
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| च परा काष्ठा--इत्येतदेवमन्तेन ग्रन्थेन व्याख्यातम् । तच्चैतत् सर्वं विमोक्षपदार्थस्य दृष्टान्तभूतं बन्धनस्य च । ते चैते मोक्षबन्धने सहेतुके सप्रपञ्चे निर्दिष्टे विद्याविद्याकार्ये, तत् सर्वं दृष्टान्तभूतमेवेति, तद्दार्ष्टान्तिकस्थानीये मोक्षबन्धने सहेतुके कामप्रश्नार्थभूते त्वया वक्तव्ये इति पुनः पर्यन्वयुङ्क्ते जनकः--अत ऊर्ध्वं विमोक्षायैव ब्रूहीति । | सम्प्रसाद और सुखकी पराकाष्ठा है—यह सब यहाँतकके ग्रन्थद्वारा बतलाया गया और यह सब मोक्षपदार्थ तथा बन्धनका दृष्टान्तभूत है। विद्या और अविद्याके कार्यभूत उन इन मोक्ष और बन्धनका हेतु और विस्तारके सहित निरूपण किया गया, किंतु वह सब दृष्टान्तरूप ही है, अतः कामप्रश्नके विषयभूत तथा उनके दार्ष्टान्तिकस्थानीय मोक्ष और बन्धनोंका आपको हेतुके सहित वर्णन करना चाहिये-इसीसे जनक फिर प्रश्न करता है कि इससे आगे मोक्षके लिये ही उपदेश कीजिये। |
| तत्र महामत्स्यवत् स्वप्नबुद्धान्तौ असङ्गः संचरत्येक आत्मा स्वयंज्योतिः--इत्युक्तम् । यथा चासौ कार्यकारणानि मृत्युरूपाणि परित्यजन्नुपाददानश्च महामत्स्यवत् स्वप्नबुद्धान्तावनुसंचरति तथा जायमानो म्रियमाणश्च तैरेव मृत्युरूपैः संयुज्यते वियुज्यते च । 'उभौ लोकावनुसंचरति' इति संचरणं स्वप्नबुद्धान्तानुसंचारस्य दार्ष्टान्तिकत्वेन सूचितम् । तदिह | ऊपर यह बतलाया गया था कि महामत्स्यके समान स्वप्न और जागरितमें एक ही स्वयंप्रकाश असङ्ग आत्मा संचार करता है। जिस प्रकार यह मृत्युके रूप देह और इन्द्रियोंको त्यागता एवं ग्रहण करता हुआ महामत्स्यके समान क्रमशः स्वप्न और जागरितस्थानोंमें संचार करता है, उसी प्रकार जन्म और मरणको प्राप्त होता हुआ भी मृत्युके रूपोंसे संयुक्त और वियुक्त होता है। 'दोनों लोकोंमें क्रमशः संचार करता है' इस वाक्यद्वारा संचारको स्वप्न और जागरितके अनुसंचारके दार्ष्टान्तिकरूपसे दिखाया है। उस संचारका यहां |