बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 1039, कुल 1402 में से
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ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०२५
| शाङ्करभाष्यम् | भाष्यार्थ |
|---|---|
| सोऽयमात्मा प्रस्तुतो यत्र यस्मिन् कालेऽबल्यमबलभावं न्येत्य गत्वा, यद् देहस्य दौर्बल्यं तदात्मन एव दौर्बल्यमित्युपचर्यतेऽबल्यं न्येत्येति, न ह्यसौ स्वतोऽमूर्तत्वादबलभावं गच्छति । तथा सम्मोहमिब—सम्मूढता सम्मोहो विवेकाभावः, सम्मूढतामिव न्येति निगच्छति । न चास्य स्वतः सम्मोहोऽसम्मोहो वास्ति, नित्यचैतन्यज्योतिःस्वभावत्वात् । तेनेवशब्दः सम्मोहमिव न्येतीति; उत्क्रान्तिकाले हि करणोपसंहारनिमित्तो व्याकुलीभावः, आत्मन इव लक्ष्यते लौकिकैः; तथा च वक्तारो भवन्ति, सम्मूढः सम्मूढोऽयमिति ।<br><br>अथवा उभयत्र इवशब्दप्रयोगो योज्यः, अबल्यमिव न्येत्य सम्मोहमिव न्येतीति, उभयस्य- | वह यह प्रस्तुत आत्मा जिस समय अबल्य–अबलभावको प्राप्त होकर, यहाँ जो देह की दुर्बलता है, वह आत्माकी ही दुर्बलता है, इस प्रकार उपचारसे कहा जाता है कि अबलभावको प्राप्त होकर, स्वयं अमूर्त होनेके कारण यह अबलभावको प्राप्त नहीं होता । तथा मानो सम्मोहको [ प्राप्त होता है ] सम्मूढताको ही सम्मोह कहते हैं, सम्मोह का अर्थ है विवेकका अभाव, इस प्रकारकी सम्मूढताको मानो प्राप्त होता है। इसे स्वतः सम्मोह अथवा असम्मोह है भी नहीं, क्योंकि यह नित्यचैतन्यज्योतिःस्वरूप है। इसीसे 'सम्मोहमिव न्येति' इसमें 'इव' शब्दका प्रयोग किया गया है; क्योंकि लौकिक पुरुषोंको उत्क्रान्तिके समय इन्द्रियोंके उपसंहारके कारण होनेवाली व्याकुलता आत्माकी-सी जान पड़ती है और ऐसा ही कहनेवाले कहते भी हैं कि यह सम्मूढ–अत्यन्त अचेत हो गया है।<br><br>अथवा 'अबल्यम्' और 'सम्मोहम्' दोनोंहीके साथ 'इव' शब्दका प्रयोग करना चाहिये; अर्थात् मानो अबलताको प्राप्त होकर मानो सम्मूढताको प्राप्त हो जाता है; क्योंकि दोनों- |
वृ० उ० ६५—