बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 1041, कुल 1402 में से
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ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ १०२७
| इत्यादिवाक्येभ्यः—हृदयमेव पुण्डरीकाकाशमन्ववक्रामत्यन्वागच्छति हृदयेऽभिव्यक्तविज्ञानो भवतीत्यर्थः, बुद्ध्यादिविक्षेपोपसंहारे सति । | है, जैसा कि “वाक् गृहीत हो जाती है, चक्षु गृहीत हो जाती है” “इस सर्ववान् लोककी मात्राको ग्रहण कर” “शुक्रको ग्रहण कर” इत्यादि वाक्योंसे सिद्ध होता है। |
| न हि तस्य स्वतश्चलनं विक्षेपोपसंहारादिविक्रिया वा; “ध्यायतीव लेलायतीव” (४।३।७) इत्युक्तत्वात् । बुद्ध्याद्युपाधिद्वारैव हि सर्वविक्रियाह्यारोप्यते तस्मिन् । | आत्माके चलन अथवा विक्षेपोपसंहारादि विकार स्वतः नहीं होते; जैसा कि “ध्यायतीव लेलायतीव” इत्यादि मन्त्रद्वारा कहा गया है। बुद्धि आदि उपाधियोंके द्वारा ही उसमें सब प्रकारके विकारका आरोप किया जाता है । |
| कदा पुनस्तस्य तेजोमात्राभ्यादानम् इत्युच्यते—स यत्रैवं चक्षुषि भवश्चाक्षुषः पुरुष आदित्यांशो भोक्तुः कर्मणा प्रयुक्तो यावद्देहधारणं तावच्चक्षुषोऽनुग्रहं कुर्वन् वर्तते, मरणकाले त्वस्य चक्षुरनुग्रहं परित्यजति, स्वमादित्यात्मानं प्रतिपद्यते। तदेतदुक्तम्—<br>“यत्रास्य पुरुषस्य मृतस्याग्निं वागप्येति वातं प्राणश्चक्षुरादित्यम्” (३।२।१३) इत्यादि । | किंतु उसकी तेजोमात्राओंका उपसंहार कब होता है ? सो बतलाया जाता है—जिस समय भी वह चक्षुमें रहनेवाला चाक्षुष पुरुष आदित्यांश, जो भोक्ताके कर्मसे प्रेरित होकर जबतक देह धारण किया जाता है, तबतक उसके नेत्रोंका उपकार करता हुआ विद्यमान रहता है, मरणकालमें इसके चक्षुका उपकार करना छोड़ देता है, अर्थात् अपने आदित्यस्वरूपको प्राप्त हो जाता है । इसीसे यह कहा है—<br>“जब इस मृत पुरुषकी वागिन्द्रिय अग्निमें, प्राण वायुमें और नेत्र आदित्यमें लीन हो जाते हैं” इत्यादि । |