भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 1071, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 1071

ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थे १०५७


संस्कृत-भाष्यम्भाषानुवाद
यस्य निगडनिवृत्तिवद् बन्धननिवृत्तिर्मोक्षः स्यात् । परमात्मव्यतिरेकेणान्यस्याभावं विस्तरेणावादिष्म । तस्मादविद्यानिवृत्तिमात्रे मोक्षव्यवहार इति चावोचाम । यथा रज्ज्वादौ सर्पाद्यज्ञाननिवृत्तौ सर्पादिनिवृत्तिः ।बद्ध है नहीं, जिसकी बेड़ियोंके टूटनेके समान बन्धननिवृत्तिरूप मुक्ति हो । परमात्मासे भिन्न किसी अन्य वस्तुका अभाव हम पहले विस्तारसे बतला चुके हैं। अतः अविद्याकी निवृत्तिमात्रसे ही मोक्ष-व्यवहार होता है—ऐसा हमारा कथन है, जिस प्रकार कि रज्जु आदिमें सर्पादिके अज्ञानकी निवृत्ति होनेपर सर्पादिकी भी निवृत्ति हो जाती है ।
येऽप्याचक्षते मोक्षे विज्ञानान्तरमानन्दान्तरं चाभिव्यज्यत इति तैर्वक्तव्योऽभिव्यक्तिशब्दार्थः । यदि तावल्लौकिक्येव उपलब्धिविषयव्याप्तिरभिव्यक्तिशब्दार्थः, ततो वक्तव्यं किं विद्यमानमभिव्यज्यतेऽविद्यमानमिति वा ?जो लोग ऐसा कहते हैं कि मोक्षमें किसी विज्ञानान्तर या आनन्दान्तरकी अभिव्यक्ति होती है, उन्हें 'अभिव्यक्ति' शब्दका अर्थ बतलाना चाहिये । यदि लौकिकी उपलब्धि अर्थात् विषयव्याप्ति ही 'अभिव्यक्ति' शब्दका अर्थ है तो यह बतलाना चाहिये कि विद्यमान सुखकी अभिव्यक्ति होती है या अविद्यमानकी ?
विद्यमानं चेद् यस्य मुक्तस्य तदभिव्यज्यते तस्यात्मभूतमेव तदिति, उपलब्धिव्यवधानानुपपत्तेर्नित्याभिव्यक्तत्वान्मुक्तस्याभिव्यज्यत इति विशेषवचनमनर्थकम् ।यदि कहें विद्यमान सुखकी अभिव्यक्तिहोती है तो जिस मुक्तके प्रति उस विद्यमान सुखकी अभिव्यक्ति होती है, उसका तो वह आत्मस्वरूप ही है, अतः नित्याभिव्यक्त होनेसे उसकी उपलब्धिमें कोई व्यवधान न हो सकनेके कारण वह मुक्तको अभिव्यक्त होता है—ऐसा विशेष वचन कहना व्यर्थ ही है ।

बृ० उ० ६७—