भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 1074, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 1074
१०६०बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ४

| गगनानां सर्पोदकरजतमलिनत्वा-<br><br>दिवददोष इत्यवोचाम । | शुक्ति और आकाशमें भासनेवाले सर्पं, जल, रजत और मालिन्यसे जैसे उनमें कोई दोष नहीं आता, उसी प्रकार आत्मामें भी अविद्या-जनित कल्पनासे कोई दोष नहीं आ सकता—ऐसा हम कह चुके हैं। | | तिमिरातिमिरदृष्टिवदविद्या-कर्तृत्वाकर्तृत्वकृत आत्मनो वि-शेषः स्यादिति चेत् ! | पूर्व०—तिमिर-रोगयुक्त और तिमिर-रोगमुक्त दृष्टिसे जैसे चन्द्रमा-का भेद प्रतीत होता है, वैसे ही अविद्याके कर्ता और अकर्ता होनेसे आत्मामें भी भेद हो जायगा ! | | न, "ध्यायतीव लेलायतीव" इति स्वतोऽविद्याकर्तृत्वस्य प्रति-षिद्धत्वात्; अनेकव्यापारसंनि-पातजनितत्वाच्च अविद्याभ्रमस्य; विषयत्वोपपत्तेश्च; यस्य च अ-विद्याभ्रमो घटादिवद् विविक्तो गृह्यते, स न अविद्याभ्रमवान् । | सिद्धान्ती--नहीं, क्योंकि "ध्यान-सा करता है, चञ्चल-सा होता है" इस श्रुतिद्वारा स्वयं आत्माके अवि-द्याकर्ता होनेका निषेध किया गया है। इसके सिवा अविद्यारूप भ्रम तो अनेक व्यापारोंके मेलसे उत्पन्न होता है तथा वह आत्माका विषय भी हे। अतः जिसके द्वारा अविद्या-रूप भ्रम घटादिके समान प्रत्यक्ष-तया ग्रहण किया जाता है, वह अविद्यारूप भ्रमवाला नहीं हो सकता ! | | 'अहं न जाने मुग्धोऽस्मि' इति प्रत्ययदर्शनादविद्याभ्रमवत्त्वमेवे-ति चेत् ! | पूर्व०—'मैं नहीं जानता, मूढ हूँ' ऐसा अनुभव देखा जानेके कारण तो आत्मा अविद्यारूप भ्रम-वाला ही सिद्ध होता है ! |