भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 1075, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 1075
ब्राह्मण ४ ]शाङ्करभाष्याथ१०६१
शाङ्करभाष्यम्अनुवाद
न, तस्यापि विवेकग्रहणात्; न हि यो यस्य विवेकेन ग्रहीता; स तस्मिन् भ्रान्त इत्युच्यते; तस्य च विवेकग्रहणम्, तस्मिन्नेव च भ्रमः—इति विप्रतिषिद्धम्; न जाने मुग्धोऽस्मीति दृश्यते इति ब्रवीषि—तद्दर्शिनश्च अज्ञानं मुग्धरूपता दृश्यत इति च—तद्दर्शनस्य विषयो भवति, कर्मतामापद्यत इति । तत् कथं कर्मभूतं सत् कर्तृस्वरूपदृशिविशेषणम् अज्ञानमुग्धते स्याताम् ? अथ दृशिविशेषणत्वं तयोः, कथं कर्म स्याताम्—दृशिना व्याप्येते ? कर्म हि कर्तृक्रियया व्याप्यमानं भवति; अन्यच्च व्याप्यम्, अन्यद् व्यापकम्; न तेनैव तद् व्याप्यते; वद कथमेवं सति, अज्ञानमुग्धते दृशिविशेषणे स्याताम् ? न चाज्ञानविवेकदर्शी अज्ञान-**सिद्धान्ती—**ऐसी बात नहीं है; क्योंकि उस अनुभवका भी पृथक् करके ग्रहण होता है और जो जिसका पृथक् करके ग्रहण करनेवाला है; वह उसमें भ्रान्त है—ऐसा कहा नहीं जा सकता । उसीका तो पृथक् करके ग्रहण होता है और उसीमें भ्रान्ति है—ऐसा कहना तो विरुद्ध है । ‘मैं नहीं जानता, मुग्ध हूँ’ यह अनुभव दिखायी देता है—ऐसा तुम कहते हो और ऐसा भी कहते हो कि उसे देखनेवालेकी अज्ञान एवं मुग्धरूपता देखी जाती है—इस प्रकार तो वे अज्ञानादि दर्शनके विषय अर्थात् कर्मरूपताको प्राप्त हो जाते हैं । तब कर्मभूत होकर वे अज्ञान और मुग्धता कर्तृस्वरूप साक्षीके विशेषण किस प्रकार हो सकते हैं? और यदि वे साक्षीके विशेषण हैं तो वे उसके कर्म कैसे हो सकते हैं अर्थात् साक्षीसे व्याप्त कैसे होंगे ? कर्म तो कर्ताकी क्रियासे व्याप्त होनेवाला होता है तथा व्याप्य दूसरा होता है और व्यापक दूसरा; वह उसीसे व्याप्त नहीं होता । ऐसी स्थितिमें बतलाओ, अज्ञान और मुग्धता साक्षीके विशेषण किस प्रकार हो सकते हैं? तथा अज्ञानको अपनेसे पृथक् देखनेवाला—अज्ञान-