बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 1088, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें| १०७४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ४ |
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| च यथादर्शनम्। नाड्यस्तु एताः सुषुम्नाद्याः श्लेष्मादिरससम्पूर्णाः 'शुक्लस्य नीलस्य पिङ्गलस्य' (४।३।२०) इत्याद्युक्तत्वात् ।<br><br>आदित्यं वा मोक्षमार्गम् एवंविधं मन्यन्ते—"एष शुक्ल एष नीलः" ( छा० उ० ८ । ६ । १ ) इत्यादिश्रुत्यन्तरात् । दर्शनमार्गस्य च शुक्लादिवर्णासंभवात्, सर्वथापि तु प्रकृताद् ब्रह्मविद्यामार्गादन्य एते शुक्लादयः ।<br><br>ननु शुक्लः शुद्धोऽद्वैतमार्गः ।<br><br>न, नीलपीतादिशब्दैर्वर्णवाचकैः सहानुद्रवणात्; यान् शुक्लादीन् योगिनो मोक्षपथान् आहुः, न ते मोक्षमार्गाः; संसारविषया एव हि ते—"चक्षुषो वा मूर्ध्नो वान्येभ्यो वा शरीरदेशेभ्यः" ( बृ० उ० ४ । ४ । २ ) इति शरीरदेशानिःसरणसंबन्धाद् ब्रह्मादिलोकप्रापका हि ते । तस्मादयमेव मोक्षमार्गः—य आत्मकामत्वेन आप्तकामतया सर्वकामक्षये गमनानुप- | वर्ण बतलाते हैं। किंतु ये श्लेष्मादि रससे परिपूर्ण सुषुम्नादि नाडियाँ ही हैं, क्योंकि उन्हींके विषयमें 'शुक्लस्य नीलस्य पिङ्गलस्य' इत्यादि कहा गया है।<br><br>अथवा वे आदित्यरूप मोक्षमार्गको ऐसा मानते हैं, जैसा कि "यह शुक्ल है, यह नील है" इत्यादि अन्य श्रुतिमें कहा गया है। ज्ञानमार्गके तो शुक्लादि वर्ण होने असम्भव हैं; सभी प्रकार प्रकृत ब्रह्मविद्यारूप मार्गसे तो ये शुक्लादि भिन्न ही हैं।<br><br>पूर्व०—किंतु शुक्ल अर्थात् शुद्ध तो अद्वैतमार्ग हो सकता है !<br><br>सिद्धान्ती—नहीं, क्योंकि इसका वर्णवाचक नील-पीतादि शब्दोंके साथ उच्चारण किया गया है। योगीलोग जिन शुक्लादि मोक्षमार्गोंके विषयमें कहते हैं, वे मोक्षमार्ग नहीं हैं; उनका विषय तो संसार ही है—"चक्षुसे, मूर्धासे अथवा शरीरके किन्हीं अन्य भागोंसे" इस प्रकार शरीरके भागोंसे जीवके निकलनेका सम्बन्ध होनेके कारण वे तो ब्रह्मलोकादिकी प्राप्ति करानेवाले ही हैं। अतः जो आत्मकामतत्वके द्वारा आप्तकाम हो जानेसे सम्पूर्ण कामनाओंका |