भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 1089, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 1089

ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ [१०७५


संस्कृत-भाष्यम्भाषार्थ
पत्तौ प्रदीपनिर्वाणवच्चक्षुरादीनां कार्यकारणानामत्रैव समवनयः— इति एष ज्ञानमार्गः पन्थाः, ब्रह्मणा परमात्मस्वरूपेणैव ब्राह्मणेन त्यक्तसर्वैषणेन, अनुवित्तः। तेन ब्रह्मविद्यामार्गेण ब्रह्मविदन्यः अपि एति।क्षय हो जानेपर कहीं जाना सम्भव न होनेसे दीपकके बुझ जानेके समान चक्षु आदि देह और इन्द्रियोंका यहीं लीन हो जाना है—यही मोक्षमार्ग है। ‘एष पन्थाः’ यह ज्ञानमार्ग ब्रह्मके द्वारा अर्थात् जिसने समस्त एषणाएँ त्याग दी हैं, उस परमात्मस्वरूप ब्रह्मज्ञके द्वारा ही अनुवित्त है। उस ब्रह्मविद्यारूप मार्गसे अन्य ब्रह्मवेत्ता भी ब्रह्मको प्राप्त हो सकता है।
कीदृशो ब्रह्मवित् तेन एति ? इत्युच्यते—पूर्वं पुण्यकृद् भूत्वा पुनस्त्यक्तपुत्राद्येषणः, परमात्मतेजस्यात्मानं संयोज्य तस्मिन्प्रभिनिर्वृत्तस्तैजसश्च–आत्मभूत इहैव इत्यर्थः; ईदृशो ब्रह्मवित् तेन मार्गेण एति।उस मार्गसे किस प्रकारका ब्रह्मवेत्ता जाता है ? सो बतलाया जाता है--पहले पुण्य करनेवाला होकर फिर पुत्रादि एषणाओंसे मुक्त हो जो परमात्मतेजमें अपनेको जोड़कर उसीमें उपशान्त हो गया है अर्थात् इस शरीरमें ही उस परमात्मतेजसे सम्पन्न आत्मभूत हो गया है, ऐसा ब्रह्मवेत्ता उस मार्गसे जाता है।
न पुनः पुण्यादिसमुच्चयकारिणो ग्रहणम्, विरोधादित्यवोचाम; “अपुण्यपुण्योपरमे यं पुनर्भवनिर्भयाः। शान्ताः संन्यासिनो यान्ति तस्मै मोक्षात्मने नमः॥” (महा० शा० ४७। ५५) इति च स्मृतेः; “त्यज धर्ममधर्मं च”यहाँ ‘पुण्यकृत्’ शब्दसे पुण्यादिसमुच्चय करनेवालोंको ग्रहण नहीं किया गया; क्योंकि ज्ञान और कर्मका परस्पर विरोध है--ऐसा हम कह चुके हैं। इस विषयमें “पाप और पुण्यकी निवृत्ति होनेपर जिसे पुनर्जन्मसे निर्भय एवं शान्त संन्यासी प्राप्त करते हैं, उस मोक्षात्माको नमस्कार है” ऐसी स्मृति भी है तथा “धर्म और अधर्मका त्याग करो’