भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 1090, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 1090
१०७६बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ४

| इत्यादिपुण्यापुण्यत्यागोपदेशात्; <br> “निराशिषमनारम्भं निर्नमस्कार- <br> मस्तुतिम्। अद्गीणं क्षीणकर्माणं <br> तं देवा ब्राह्मणं विदुः॥” <br> “नैतादृशं ब्राह्मणस्यास्ति वित्तं <br> यथैकता समता सत्यता च। <br> शीलं स्थितिर्दण्डनिधानमार्जवं <br> ततस्ततश्चोपरमः क्रियाभ्यः॥” <br> इत्यादिस्मृतिभ्यश्च। | इत्यादि प्रकारसे पुण्य पापके त्याग- <br> का भी उपदेश दिया गया है। “जो <br> सब प्रकारकी आशाओंसे रहित, <br> आरम्भ-शून्य, नमस्कार और स्तुति <br> आदि न करनेवाला, निषिद्धाचरण- <br> से रहित और क्षीणकर्मा है, उसे <br> देवगण ब्राह्मण (ब्रह्मवेत्ता) मानते <br> हैं” तथा “ब्रह्मवेत्ताका ऐसा कोई <br> धन नहीं है जैसे कि एकता, <br> समता, सत्यता, शील, स्थिति, <br> अहिंसा, सरलता और विभिन्न <br> प्रकारकी क्रियाओंसे निवृत्त होना <br> है” इत्यादि स्मृतियोंसे भी यही <br> बात सिद्ध होती है। | | उपदेक्ष्यति च इहापि तु— <br> “एष नित्यो महिमा ब्राह्मणस्य <br> न वर्धते कर्मणा नो कनीयान्” <br> (४।४।२३) इति कर्म- <br> प्रयोजनाभावे हेतुमुक्त्वा, <br> “तस्मादेवंविच्छान्तो दान्तः” <br> (४।४।२३) इत्यादिना <br> सर्वक्रियोपरमम्। तस्माद् यथा- <br> व्याख्यातमेव पुण्यकृत्त्वम्। | यहाँ भी “यह ब्रह्मवेत्ताकी <br> नित्य महिमा है, जो कर्मसे न तो <br> बढ़ती है और न घटती ही है' इस <br> प्रकार कर्मके प्रयोजनके अभावमें <br> हेतु बतलाकर “अतः इस प्रकार <br> जाननेवाला शान्त, दान्त [उपरत <br> होकर ]” इत्यादि वाक्यसे सम्पूर्ण <br> क्रियाओंसे उपरतिका उपदेश दिया <br> जायगा। अतः यहाँ जिस प्रकार <br> ऊपर व्याख्या की गयी है, वही <br> ‘पुण्यकृत्’ का स्वरूप है। | | अथवा यो ब्रह्मवित् तेन <br> एति, स पुण्यकृत् तैजसश्च— <br> इति ब्रह्मवित्स्तुतिरेषा; पुण्य- <br> कृति तैजसे च योगिनि <br> महाभाग्यं प्रसिद्धं लोके, | अथवा जो ब्रह्मवेत्ता उस मार्गसे <br> जाता है वह पुण्यकर्मा और तैजस <br> है—इस प्रकार यह ब्रह्मवेत्ताकी <br> स्तुति है। पुण्यकृत् और तैजस <br> योगीमें महाभाग्य रहता है—यह <br> लोकमें प्रसिद्ध है; अतः लोकमें |