भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 1095, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 1095

ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०८१

शरीरमें प्रविष्ट हुआ आत्मा जिस ब्राह्मणको प्राप्त और ज्ञात हो गया है, वही विश्वकृत् (कृतकृत्य) है। वही सबका कर्ता है, उसीका लोक है और स्वयं वही लोक भी है ॥ १३ ॥

| यस्य ब्राह्मणस्य, अनुवित्तः— अनुलब्धः, प्रतिबुद्धः साक्षात्कृतः, कथम् ? अहमस्मि परं ब्रह्मेत्येवं प्रत्यगात्मत्वेनावगतः; आत्मा अस्मिन् संदेहे संदेहे-अनेकानर्थसंकटोपचये, गहने विषमे-अनेकशतसहस्रविवेकविज्ञानप्रतिपक्षे विषमे प्रविष्टः; स यस्य ब्राह्मणस्यानुवित्तः प्रतिबोधेनेत्यर्थः स विश्वकृद् विश्वस्य कर्ता; <br><br> कथं विश्वकृत्त्वम्, तस्य किं विश्वकृदिति नाम इत्याशङ्क्याह—स हि यस्मात् सर्वस्य कर्ता, न नाममात्रम्; न केवलं विश्वकृत् परप्रयुक्तः सन्, किं तर्हि ? तस्य लोकः सर्वः; किमन्यो लोकः, अन्योऽसौ ? इत्युच्यते—स उ लोक एव; लोकशब्देन | जिस ब्राह्मणको आत्मा अनुवित्त अनुलब्ध और प्रतिबुद्ध-साक्षात्कृत है, किस प्रकार—'मैं परब्रह्म हूँ' इस प्रकार प्रत्यगात्मस्वरूपसे ज्ञात है; इस संदेह्य—संदेह अर्थात् अनेकों अनर्थ-समूहोंके पुञ्ज और गहन—विषम यानी विवेक-विज्ञानके अनेकों शतसहस्र प्रतिपक्षोंके कारण विषमस्थानमें प्रविष्ट हुआ जो आत्मा है, वह जिस ब्राह्मणको प्रतिबोध—साक्षात्कारके द्वारा उपलब्ध है—ऐसा इसका तात्पर्य है, वह विश्वकृत्—विश्वका कर्ता ( रचनेवाला ) है । <br><br> उसका विश्वकर्तृत्व किस प्रकार है, क्या 'विश्वकृत्' यह उसका नाम है ? ऐसी आशङ्का करके श्रुति कहती है--क्योंकि वही सबका कर्ता है, यह केवल उसका नाम ही नहीं है। वह किसी अन्यके द्वारा प्रेरित होनेसे विश्वकृत् नहीं है; तो फिर क्या बात है ? उसीका सारा लोक है। तो क्या लोक दूसरा है और वह दूसरा है ?--इसपर कहा जाता है—वही लोक भी है। यहाँ |