बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 1103, कुल 1402 में से
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ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०८९
चाहिये। यह ब्रह्म अप्रमेय, ध्रुव, निर्मल, [ अव्याकृतरूप ] आकाशसे भी सूक्ष्म, अजन्मा, आत्मा, महान् और अविनाशी है ॥ २० ॥
| संस्कृत भाष्य | भाष्यार्थ |
|---|---|
| एकधैव एकेनैव प्रकारेण विज्ञानघनैकरसप्रकारेण आकाशवन्निरन्तरेण अनुद्रष्टव्यम्, यस्मादेतद् ब्रह्म अप्रमयम् अप्रमेयम्, सर्वैकत्वात्; अन्येन हि अन्यत् प्रमीयते; इदं त्वेकमेव, अतोऽप्रमेयम्; ध्रुवं नित्यं कूटस्थमविचालीत्यर्थः । | एकधा—एक प्रकारसे ही अर्थात् आकाशके समान निरन्तर एकमात्र विज्ञानघन रसस्वरूपसे ही अनुदर्शन करना चाहिये (आचार्योपदेशके अनन्तर देखना चाहिये ); क्योंकि यह ब्रह्म अप्रमय-अप्रमेय है, कारण ब्रह्ममें सबकी एकता है। अन्यके द्वारा ही अन्यकी प्रमिति (प्रमाबुद्धि) होती है, किंतु ब्रह्म तो एक ही है, इसलिये यह अप्रमेय है तथा ध्रुव—कूटस्थ यानी विचलित न होनेवाला है। |
| ननु विरुद्धमिदमुच्यते—अप्रमेयं ज्ञायत इति च; 'ज्ञायते' इति प्रमाणैर्मीयत इत्यर्थः, 'अप्रमेयम्' इति च तत्प्रतिषेधः । | शङ्का—किंतु 'ब्रह्म अप्रमेय है और वह जाना जाता है' यह कथन तो विरुद्ध है। जाना जाता है—इससे तो यही तात्पर्य है कि प्रमाणोंद्वारा उसका मान होता है और अप्रमेय—ऐसा कहनेसे उसका प्रतिषेध होता है। |
| नैष दोषः, अन्यवस्तुवद् अनागमप्रमाणप्रमेयत्वप्रतिषेधार्थत्वात्; यथा अन्यानि वस्तूनि आगमनिरपेक्षैः प्रमाणैर्विषयी- | समाधान—यहाँ यह दोष नहीं है; क्योंकि 'अप्रमेयम्' यह विशेषण, अन्य वस्तुओंके समान उसके आगमातिरिक्त प्रमाणसे प्रमित होनेका प्रतिषेध करनेके लिये है। जिस प्रकार अन्य वस्तुएँ आगमकी अपेक्षा न रखकर अन्य प्रमाणोंका विषय |
बृ० उ० ६९—