बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 1111, कुल 1402 में से
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ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०७७
| शाङ्करभाष्य | भाष्यार्थ |
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| न्जातिकृतम्—यथा राजकुमारस्य बलवत्तरानपि भृत्यान् प्रति, <br><br> तन्माभूदित्याह—सर्वस्याधिपतिः—अधिष्ठाय पालयिता, <br><br> स्वतन्त्र इत्यर्थः, न राजपुत्रवदमात्यादिभृत्यतन्त्रः । | (शासकत्व) कभी कभी जातिकृत भी होता है, जैसा कि राजकुमारका अपनेसे अधिक बलशाली सेवकोंके प्रति भी शासन है, परमात्माका शासकत्व वैसा न समझा जाय इसलिये श्रुति कहती है—सबका अधिपति—सबका अधिष्ठाता होकर पालन करनेवाला अर्थात् स्वतन्त्र है, राजकुमारके समान मन्त्री आदि सेवकोंके अधीन नहीं है । |
| त्रयमप्येतद् वशित्वादि हेतुहेतुमद्रूपम्—यस्मात् सर्वस्याधिपतिः, ततोऽसौ सर्वस्येशानः, यो हि यमधिष्ठाय पालयति, स तं प्रतीष्ट एवेति प्रसिद्धम्, यस्माच्च सर्वस्येशानः, तस्मात् सर्वस्य वशीति । | ये वशित्वादि तीनों ही हेतुहेतुमद्रूप हैं ।^१ क्योंकि यह सबका अधिपति है, इसलिये यह सबका ईशान है । जो जिसका अधिष्ठाता होकर पालन करता है, वह उसके प्रति ईशन करता ही है—यह प्रसिद्ध है । और चूँकि यह सबका ईशान है, इसलिये सबका वशी है । |
| किं चान्यत्, स एवम्भूतो हृद्यन्तर्ज्योतिः पुरुषो विज्ञानमयो न साधुना शास्त्रविहितेन कर्मणा भूयान् भवति, न वर्धते पूर्वावस्थातः केनचिद्धर्मेण, नो एव शास्त्रप्रतिषिद्धेन असाधुना कर्मणा कनीयान् अल्पतरो भवति, पूर्वावस्थातो न हीयत इत्यर्थः । | इसके सिवा दूसरी बात यह है कि वह इस प्रकारका हृदयस्थित ज्योतिःस्वरूप विज्ञानमय पुरुष साधु अर्थात् शास्त्रविहित कर्मसे भूयान् नहीं होता । अपनी पूर्वावस्थाकी अपेक्षा किसी धर्मके कारण बढ़ नहीं जाता और न किसी असाधु अर्थात् शास्त्रप्रतिषिद्ध कर्मसे कनीयान्—यानी बहुत छोटा ही होता है अर्थात् पूर्वावस्थासे हीन नहीं होता । |
१. अर्थात् एकमें दूसरा हेतु है ।