बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 1112, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें१०९८ बृहदारण्यकोपनिषद् [अध्याय ४
| किं च सर्वो हि अधिष्ठानपालनादि कुर्वन् परानुग्रहपीडाकृतेन धर्माधर्माख्येन युज्यते, अस्यैव तु कथं तदभाव इत्युच्यते—यस्मादेष सर्वेश्वरः सन् कर्मणोऽपीशितुं भवत्येव शीलमस्य, तस्माद्व न कर्मणा संबध्यते। किं च एष भूताधिपतिर्ब्रह्मादिस्तम्बपर्यन्तानां भूतानामधिपतिरित्युक्तार्थं पदम्।<br><br>एष भूतानां तेषामेव पालयिता रक्षिता। एष सेतुः, किंविशिष्ट इत्याह—विधरणः—वर्णाश्रमादिव्यवस्थाया विधारयिता, तदाह—एषां भूरादीनां ब्रह्मलोकान्तानां लोकानाम् असंभेदाय असंभिन्नमर्यादायै। परमेश्वरेण सेतुवदविधार्यमाणा लोकाः संभिन्नमर्यादाः स्युः, अतो लोकानामसंभेदाय | इसके सिवा [यह देखा जाता है कि] अधिष्ठान और पालनादि करनेवाले सभी लोग दूसरोंपर कृपा या कठोरताके कारण धर्म या अधर्म संज्ञक उनके फलसे युक्त होते हैं, इस आत्माको ही वे फल क्यों नहीं प्राप्त होते? सो बतलाया जाता है—क्योंकि यह सबका ईश्वर है, अतः इसका स्वभाव कर्मका शासन करनेका भी है, इसलिये कर्मसे इसका सम्बन्ध नहीं होता। तथा यह भूताधिपति अर्थात् ब्रह्मासे लेकर स्तम्बपर्यन्त समस्त भूतोंका अधिपति है—इस प्रकार इस पदका अर्थ पहले कहा जा चुका है।<br><br>उन्हीं भूतोंका यह पालयिता—रक्षा करनेवाला है यह सेतु है; किन विशेषणोंवाला सेतु है। सो श्रुति बतलाती है—विधरण अर्थात् वर्णाश्रमादि व्यवस्थाका विधारण करनेवाला; यही बात श्रुति कहती है—इन भूर्लोकसे लेकर ब्रह्मलोकपर्यन्त लोकोंके असम्भेदके लिये अर्थात् मर्यादाका भेदन न होनेके लिये। यदि परमेश्वर सेतुके समान लोकोंका विधारण न करें तो उनकी मर्यादा टूट जाय। अतः लोकोंके |