भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 112, कुल 1402 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 112
१०६बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय १
निमित्तत्वात्तु भोजनादिकर्मणोऽनियतत्वं स्यात्। दोषोद्भवविभवयोरनियतत्वात् कामानाभिव काम्येषु। शास्त्रनिमित्तकालाद्यपेक्षत्वाच्च नित्यानामनियतत्वानुपपत्तिः। दोषनिमित्तत्वे सत्यपि यथा काम्याग्निहोत्रस्य शास्त्रविहितत्वात् सायं प्रातःकालाद्यपेक्षत्वमेवम्।हैं, इसलिये उनका तो अनियत होना सम्भव है, क्योंकि काम्य विषयोंकी कामनाके समान उन दोषोंकी उत्पत्ति और निवृत्ति अनियत हैं; किंतु शास्त्रजनित कालादिकी अपेक्षावाले होनेसे नित्य कर्मोंका अनियत होना नहीं बन सकता। जिस प्रकार काम्य अग्निहोत्रको शास्त्रविहित होनेके कारण सायंकाल, प्रातःकालादिकी अपेक्षा है उसी प्रकार दोषनिमित्तक होनेपर भी नित्यकर्मोंको नियमकी अपेक्षा है।
तद्भोजनादिप्रवृत्तौ नियमवत्स्यादिति चेत् ?पूर्व०- वह नियम भोजनादिकी प्रवृत्ति होनेपर भिक्षाटनादिके नियमके समान हो सकता है। ऐसा कहें तो !
न, नियमस्याक्रियात्वात् क्रियायाश्चाप्रयोजकत्वान्नासौ ज्ञानस्यापवादकरः। तस्मात् परमात्मयाथा-सिद्धान्ती- ऐसा नहीं कहा जा सकता, क्योंकि नियम क्रियारूप नहीं है और क्रिया प्रयोजक नहीं होती; इसलिये यह (भिक्षाटनादिका नियम) ज्ञानका विरोधी नहीं है।^१ अतः परमात्मस्वरूपके ज्ञानसे सम्बन्ध

१ तात्पर्य यह है कि भिक्षाटनादिके विषयमें जो शास्त्रकी विधि है वह जिज्ञासुके लिये है। ज्ञानवान् शास्त्रविधिसे प्रेरित होकर उसका अनुसरण नहीं करता, अपि तु उसमें उसकी प्रवृत्ति स्वभावतः ही होती है। इसलिये वह विधि ज्ञानकी विरोधिनी नहीं है। किंतु नित्यकर्मादिके लिये जो विधि है उसमें हेयोपादेयबुद्धिवाले पुरुषकी ही प्रवृत्ति हो सकती है, इसलिये बोधवान्‌का उसमें प्रवृत्त न होना स्वाभाविक ही है।