बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 1127, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 1127
ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १११३
| परिकल्प्येत पारिव्राज्यस्य, स इहैव मुख्यो नान्यत्र संभवति । यदप्यनधिकृतविषये पारिव्राज्यं परिकल्प्यते, तत्र वृक्षाद्यारोहणाद्यपि पारिव्राज्यवत् कल्प्येत, कर्तव्यत्वेनानिर्ज्ञातत्वाविशेषात् । तस्मात् स्तुतित्वगन्धोऽप्यत्र न शक्यः कल्पयितुम् । | (संन्यास) की विधिकी कल्पना की जाय, तो यहीं मुख्य विधि होगी । उसका अन्यत्र होना सम्भव नहीं है । यदि [ कर्मके ] अनधिकारीके विषयमें पारिव्राज्यकी कल्पना की जाय, तो उसके लिये तो पारिव्राज्यके समान वृक्ष आदिपर चढ़ने आदिकी भी कल्पना की जा सकती है; क्योंकि कर्तव्यरूपसे ज्ञात न होनेमें दोनों समान हैं ।^१ अतः इस वाक्यके स्तुतिरूप होनेकी लेशमात्र भी कल्पना नहीं की जा सकती । |
| यद्ययमात्मा लोक इष्यते, किमर्थं तत्प्राप्तिसाधनत्वेन कर्माण्येव नारभेरन्, किं पारिव्राज्येनेति ? | **शङ्का—**यदि आत्मरूप लोककी इच्छा की जाती है, तो उसकी प्राप्तिके साधनरूपसे कर्मोंका ही आरम्भ क्यों नहीं करते, पारिव्राज्यसे क्या प्रयोजन है ? |
| **अत्रोच्यते—**अस्य आत्मलोकस्य कर्मभिरसंबन्धात् । यमात्मानमिच्छन्तः प्रव्रजेयुः, स आत्मा साधनत्वेन फलत्वेन च उत्पाद्यत्वादिप्रकाराणामन्यतमत्वेनापि कर्मभिर्न संबध्यते; | **समाधान—**इसपर हमारा यह कथन है कि इस आत्मलोकका कर्मोंसे कोई सम्बन्ध न होनेके कारण इसके लिये कर्मोंका आरम्भ नहीं किया जाता है। लोग जिस आत्माकी इच्छा करते हुए संन्यास करें, उस आत्माका साधनरूपसे, फलरूपसे अथवा उत्पाद्य, आप्य, संस्कार्य, विकार्य—इन चार प्रकारोंमेंसे किसी भी एक रूपसे कर्मोंके साथ सम्बन्ध |
१. अर्थात् अनधिकारीके लिये न तो संन्यास ही कर्तव्य बताया गया है और न वृक्ष आदिपर चढ़ना आदि हो ।