भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 1128, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 1128
१११४बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ४
संस्कृतहिन्दी
तस्मात् 'स एष नेति नेत्यात्माऽगृह्यो न हि गृह्यते'—इत्यादि-लक्षणः।नहीं होता। अतः 'वह नेति-नेति इस प्रकार निर्देश किया गया आत्मा अगृह्य है, उसका ग्रहण नहीं किया जाता'—इत्यादि वचनोंसे बताये हुए लक्षणवाला है।
यस्मादेवंलक्षण आत्मा कर्मफलसाधनासम्बन्धीसर्वसंसारधर्मविलक्षणः, अशनायाद्यतीतः, अस्थूलादिधर्मवान्, अजोऽजरोऽमरोऽमृतोऽभयः सैन्धवघनवद्विज्ञानैकरसस्वभावः स्वयंज्योतिरेक एवाद्वयः, अपूर्वोऽनपरोऽनन्तरोऽबाह्यः—इत्येतदागमतस्तर्कतश्च स्थापितम्, विशेषतश्चेह जनकयाज्ञवल्क्यसंवादेऽस्मिन्; तस्मादेवंलक्षणे आत्मनि विदिते आत्मत्वेन नैव कर्मारम्भ उपपद्यते। तस्मादात्मा निर्विशेषः।क्योंकि ऐसे लक्षणवाला आत्मा कर्मके फल या साधनसे असम्बद्ध सम्पूर्ण संसारधर्मोंसे विलक्षण क्षुधादि धर्मोंसे अतीत, अस्थूलत्व आदि धर्मोंसे युक्त, अजन्मा, अजर, अमर, अमृत, अभय, लवणखण्डके समान एकमात्र विज्ञानरसस्वरूप, स्वयंज्योति, एकमात्र, अद्वितीय, अपूर्व, अनपर, (जिससे बढ़कर दूसरा कोई उत्कृष्ट तत्त्व नहीं हो) अनन्तर और अबाह्य है—ऐसा आगम और तर्कद्वारा निश्चय किया गया है और विशेषतः यहाँ इस जनक-याज्ञवल्क्यसंवादमें इसका निरूपण किया गया है; अतः ऐसे लक्षणोंवाले आत्माको आत्मस्वरूपसे जान लेनेपर कर्मका आरम्भ होना सम्भव नहीं है। इसलिये आत्मा निर्विशेष है।
न हि चक्षुष्मान् पथि प्रवृत्तोऽहनि कूपे कण्टके वा पतति; कृत्स्नस्य च कर्मफलस्य विद्याफलेऽन्तर्भावात्; न चायत्नप्राप्येकोई भी नेत्रवाला दिनके समय मार्गमें चलता हुआ कूएँ या काँटोंमें नहीं गिरता; और कर्मके भी सारे फलका ज्ञानके फलमें ही अन्तर्भाव हो जाता है; तथा जो वस्तु बिना प्रयत्नके ही प्राप्त हो सकती है, उसके