बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 113, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ेंब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०७
| त्म्यज्ञानविधेरपि तद्विपरीतस्थूलद्वैतादिज्ञाननिवर्तकत्वात् सामर्थ्यात्सर्वकर्मप्रतिषेधविध्यर्थत्वं सम्पद्यते; कर्मप्रवृत्त्यभावस्य तुल्यत्वाद् यथा प्रतिषेधविषये। तस्मात् प्रतिषेधविधिवच्च वस्तुप्रतिपादनं तत्परत्वं च सिद्धं शास्त्रस्य ॥ १॥ . | रखनेवाली ( तत्त्वमसि आदि ) विधि भी उससे विपरीत स्थूल एवं द्वैतादि ज्ञानकी निवृत्ति करनेवाली होनेसे अपनी सामर्थ्यसे ही सब प्रकारसे कर्मका प्रतिषेध करनेवाली हो जाती है, क्योंकि उसमें कर्मकी प्रवृत्तिका अभाव वैसा ही है जैसा कि प्रतिषेधविषयक वाक्योंमें¹। अतः प्रतिषेधविधिके समान ही तत्त्वमसि आदि शास्त्रका वस्तुप्रतिपादक और कर्म-निषेधपरक होना भी सिद्ध होता है ॥ १॥ |
वाक्का उद्गान और उसका पापविद्ध होना
ते ह वाचमूचुस्त्वं न उद्गायेति तथेति तेभ्यो वागुदगायत् । यो वाचि भोगस्तं देवेभ्य आगायद्यत् कल्याणं वदति तदात्मने । ते विदुरनेन वै न उद्गात्रात्येष्यन्तीति तमभिद्रुत्य पाप्मनाविध्यन्स यः स पाप्मा यदेवेदमप्रतिरूपं वदति स एव स पाप्मा ॥ २ ॥
उन देवताओंने वाक्से कहा, “तुम हमारे लिये उद्गान करो।” वाक्ने 'बहुत अच्छा' ऐसा कहकर उनके लिये उद्गान किया। उसने जो वाणीमें भोग था उसे देवताओंके लिये गान किया और जो शुभ भाषण करती थी उसे अपने लिये गाया। तब असुरोंने जाना कि इस उद्गाताके
¹ जैसे निषेध शास्त्रको मानकर निषिद्ध भक्षण आदिमें प्रवृत्ति नहीं होती, उसी प्रकार 'तत्त्वमसि' आदि वचनोंके सामर्थ्यसे कर्मोंमें प्रवृत्तिका अभाव होता है। इस प्रकार दोनोंमें समानता है।