बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 1141, कुल 1402 में से
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पञ्चम ब्राह्मण
याज्ञवल्क्य-मैत्रेयी-संवाद
| आगमप्रधानेन मधुकाण्डेन ब्रह्मतत्त्वं निर्धारितम्। पुनः तस्यैवोपपत्तिप्रधानेन याज्ञवल्कीयेन काण्डेन पक्षप्रतिपक्षपरिग्रहं कृत्वा विगृह्यवादेन विचारितम्। शिष्याचार्यसम्बन्धेन च षष्ठे प्रश्नप्रतिवचनन्यायेन सविस्तरं विचार्योपसंहृतम्। अथेदानीं निगमनस्थानीयं मैत्रेयीब्राह्मणमारभ्यते। अयं च न्यायो वाक्यकोविदैः परिगृहीतः—<br>‘हेत्वपदेशात् प्रतिज्ञायाः पुनर्वचनं निगमनम्’ इति। | [ द्वितीय अध्यायमें ] आगमप्रधान मधुकाण्डद्वारा ब्रह्मतत्वका निश्चय किया गया। फिर [ तीसरे अध्यायमें ] युक्तिप्रधान याज्ञवल्कीय काण्डद्वारा उसीके पक्ष-प्रतिपक्ष लेकर जल्पन्यायद्वारा विचार किया गया और तदनन्तर इस छठे प्रपाठक [ अर्थात् चतुर्थ अध्यायमें ] गुरु-शिष्यसम्बन्धसे प्रश्नोत्तरकी शैलीद्वारा उसका विस्तारपूर्वक विचार करके उपसंहार किया गया। उसके पश्चात् अब निगमनस्थानीय मैत्रेयीब्राह्मण आरम्भ किया जाता है। वाक्यमर्मज्ञोंने इस न्यायको स्वीकार भी किया है यथा—‘हेतुका उल्लेख करके प्रतिज्ञाका पुनः कथन करना निगमन है’ इति। |
| अथवाऽऽगमप्रधानेन मधुकाण्डेन यदमृतत्वसाधनं ससंन्यासमात्मज्ञानमभिहितम्, तदेव तर्केणाप्यमृतत्वसाधनं ससंन्यासमात्मज्ञानमधिगम्यते । तर्कप्रधानं हि याज्ञवल्कीयं काण्डम्; तस्माच्छास्त्रतर्काभ्यां निश्चितमेतत्—यदेतदात्मज्ञानं ससंन्यासममृतत्वसाधनमिति। | अथवा आगमप्रधान मधुकाण्डने जिस संन्यासयुक्त आत्मज्ञानको अमृतत्वका साधन बतलाया है, वही ससंन्यास आत्मज्ञान तर्कसे भी अमृतत्वका साधन जाना जाता है। याज्ञवल्कीय काण्ड तर्कप्रधान ही है; अतः यह जो अमृतत्वका साधन संन्यासयुक्त आत्मज्ञान है, वह शास्त्र और तर्क दोनोंहीसे निश्चित है। |