बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 1142, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें| ११२८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४ |
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| तस्माच्छास्त्रश्रद्धावद्भिरमृतत्वप्रतिपित्सुभिरेतत् प्रतिपत्तव्यमिति आगमोपपत्तिभ्यां हि निश्चितोऽर्थः श्रद्धेयो भवति, अव्यभिचारादिति । अक्षराणां तु चतुर्थे यथा व्याख्यातोऽर्थः, तथा प्रतिपत्तव्योऽत्रापि । यान्यक्षराण्यव्याख्यातानि तानि व्याख्यास्यामः। | इसलिये अमृतत्व-प्राप्तिके इच्छुक एवं शास्त्रमें श्रद्धा रखनेवाले पुरुषोंको इसे प्राप्त करना चाहिये, क्योंकि शास्त्र और युक्ति दोनोंहीके द्वारा निश्चय किया हुआ अर्थ अव्यभिचारी होनेके कारण श्रद्धेय होता है। इन अक्षरोंके अर्थकी तो चतुर्थ प्रपाठक [यानी द्वितीय अध्याय] में जिस प्रकार व्याख्या की गयी है, वैसी ही यहाँ भी समझनी चाहिये । वहाँ जिन अक्षरोंकी व्याख्या नहीं की गयी, उनकी व्याख्या हम यहाँ करेंगे। |
याज्ञवल्क्य और उनकी दो स्त्रियाँ
अथ ह याज्ञवल्क्यस्य द्वे भार्ये बभूवतुर्मैत्रेयी च कात्यायनी च तयोर्ह मैत्रेयी ब्रह्मवादिनी बभूव स्त्रीप्रज्ञैव तर्हि कात्यायन्यथ ह याज्ञवल्क्योऽन्यद्वृत्तमुपाकरिष्यन् ॥ १ ॥
यह प्रसिद्ध है कि याज्ञवल्क्यकी मैत्रेयी और कात्यायनी ये दो भार्याएँ थीं। उनमें मैत्रेयी ब्रह्मवादिनी थी और कात्यायनी तो स्त्रियोंकी-सी बुद्धिवाली ही थी। तब याज्ञवल्क्यने दूसरे प्रकारकी चर्याका आरम्भ करनेकी इच्छासे [कहा--] ॥ १ ॥
| अथेति हेतूपदेशानन्तर्यप्रदर्शनार्थः; हेतुप्रधानानि हि वाक्यान्यतीतानि । तदनन्तरमागमप्रधानेन प्रतिज्ञातोऽर्थो निगम्यते मैत्रेयीब्राह्मणेन । ह-शब्दो वृत्तावद्योतकः । | 'अथ' यह शब्द यह दिखानेके लिये है कि यह सिद्धान्तप्रतिपादक प्रकरण हेतुका उपदेश करनेके बाद आरम्भ किया गया है; क्योंकि इससे पहले हेतुप्रधान वाक्य कहे जा चुके हैं। उनके पश्चात् अब आगमप्रधान मैत्रेयीब्राह्मणद्वारा पहले प्रतिज्ञा किये हुए अर्थका निगमन किया जाता है। 'ह' शब्द पूर्ववृत्तको सूचित करनेवाला है। |