भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 1143, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 1143

ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ११२९


| याज्ञवल्क्यस्य ऋषेः किल द्वे भार्ये पत्न्यौ बभूवतुः—आस्ताम्—मैत्रेयी च नामत एका, अपरा कात्यायनी नामतः। तयोर्भार्ययोर्मैत्रेयी ह किल ब्रह्मवादिनी ब्रह्मवदनशीला बभूव आसीत् स्त्रीप्रज्ञा—स्त्रियां या उचिता सा स्त्रीप्रज्ञा—सैव यस्याः प्रज्ञा गृहप्रयोजनान्वेषणलक्षणा, सा स्त्रीप्रज्ञैव तर्हि तस्मिन् काल आसीत् कात्यायनी। अथैवं सति ह किल याज्ञवल्क्योऽन्यत् पूर्वस्माद् गार्हस्थ्यलक्षणाद् वृत्तात् पारिव्राज्यलक्षणं वृत्तमुपाकरिष्यन्नुपाचिकीर्षुः सन् ॥ १ ॥ | प्रसिद्ध है, याज्ञवल्क्य ऋषिकी दो भार्याएँ--पत्नियां थीं; एक मैत्रेयी नामवाली थी और दूसरी कात्यायनी नामवाली। उन दोनों पत्नियोंमें मैत्रेयी ब्रह्मवादिनी--ब्रह्मसम्बन्धी भाषण करनेवाली थी। किंतु कात्यायनी उस समय 'स्त्रीप्रज्ञा'--जो प्रज्ञा स्त्रियोंके योग्य हो, उसे स्त्रीप्रज्ञा कहते हैं, जिसकी वह स्त्रीप्रज्ञा अर्थात् गृहसम्बन्धी प्रयोजनकी ही खोजमें रहनेवाली बुद्धि थी, ऐसी स्त्रीप्रज्ञा ही थी। ऐसी स्थितिमें याज्ञवल्क्यने अन्य अर्थात् गार्हस्थ्यरूप पूर्वचर्यासे भिन्न संन्यासरूप चर्याका आरम्भ करनेके इच्छुक होकर [ कहा-- ] ॥ १ ॥ |

याज्ञवल्क्य-मैत्रेयी-संवाद

मैत्रेयीति होवाच याज्ञवल्क्यः प्रव्रजिष्यन् वा अरेऽहमस्मात् स्थानादस्मि हन्त तेऽनया कात्यायन्यान्तं करवाणीति ॥ २ ॥

'अरी मैत्रेयि !' ऐसा याज्ञवल्क्यने कहा—'मैं इस स्थान (गार्हस्थ्य-आश्रम ) से अन्यत्र सब कुछ त्याग कर जानेवाला हूँ, अर्थात् संन्यास लेनेका विचार है। इसलिये [ मैं तेरी अनुमति लेता हूँ और चाहता हूँ ] इस कात्यायनीके साथ तेरा बँटवारा कर दूँ' ॥ २ ॥

| हे मैत्रेयीति ज्येष्ठां भार्यामामन्त्रयामास, आमन्त्र्य चोवाच | 'हे मैत्रेयि !' इस प्रकार याज्ञवल्क्यने बड़ी स्त्रीको लक्ष्य करके सम्बोधन किया और उसे बुलाकर |