बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 1148, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें| ११३४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४ |
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| विज्ञाते—एवमेतन्नान्यथेति<br><br>निर्धारिते; किं भवति ? इत्यु-<br><br>च्यते—इदं विदितं भवति; इदं<br><br>सर्वमिति यदात्मनोऽन्यत्,<br><br>आत्मव्यतिरेकेणाभावात् ॥६॥ | अर्थात् यह ऐसा ही है, अन्य प्रकारका नहीं है—ऐसा निश्चय कर लेनेपर क्या होता है ? सो बतलाया जाता है—यह ज्ञात हो जाता है अर्थात् यह सब जो कि आत्मासे भिन्न है, जान लिया जाता है; क्योंकि आत्मासे भिन्न कुछ है ही नहीं ॥ ६ ॥ |
भेददृष्टिसे हानि दिखाकर ‘सब कुछ आत्मा ही है’ इस तत्त्वका उपदेश—
ब्रह्म तं परादाद् योऽन्यत्रात्मनो ब्रह्म वेद क्षत्रं तं परादाद् योऽन्यत्रात्मनः क्षत्रं वेद लोकास्तं परादुर्योऽन्यत्रात्मनो लोकान् वेद देवास्तं परादुर्योऽन्यत्रात्मनो देवान् वेद वेदास्तं परादुर्योऽन्यत्रात्मनो वेदान् वेद भूतानि तं परादुर्योऽन्यत्रात्मनो भूतानि वेद सर्वं तं परादाद् योऽन्यत्रात्मनः सर्वं वेदेदं ब्रह्मेदं क्षत्रमिमे लोका इमे देवा इमे वेदा इमानि भूतानीदँ सर्वं यदयमात्मा ॥ ७ ॥
ब्राह्मणजाति उसे परास्त कर देती है, जो ब्राह्मणजातिको आत्मासे भिन्न समझता है। क्षत्रियजाति उसे परास्त कर देती है, जो क्षत्रियजातिको आत्मासे भिन्न जानता है। लोक उसे परास्त कर देते हैं, जो लोकोंको आत्मासे भिन्न जानता है। देवता उसे परास्त कर देते हैं, जो देवताओंको आत्मासे भिन्न समझता है। वेद उसे परास्त कर देते हैं, जो वेदोंको आत्मासे भिन्न जानता है। भूत उसे परास्त कर देते हैं, जो भूतोंको आत्मासे भिन्न समझते हैं। सब उसे परास्त कर देते हैं, जो सबको आत्मासे भिन्न जानता है। यह ब्राह्मणजाति, यह क्षत्रियजाति, ये लोक, ये देव, ये वेद, ये भूत और ये सब जो कुछ भी हैं, यह सब आत्मा ही है ॥ ७ ॥