भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 1154, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 1154
११४०बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ४
च्छित्तिधर्मा, नोच्छित्तिधर्मा अनुच्छित्तिधर्मा। नापि विक्रियालक्षणो नाप्युच्छेदलक्षणो विनाशोऽस्य विद्यत इत्यर्थः ॥ १४ ॥उच्छित्तिधर्मा कहते हैं, जो उच्छित्तिधर्मा नहीं है वही अनुच्छित्तिधर्मा कहा गया है। तात्पर्य यह है कि इसका न तो विकाररूप विनाश होता है और न उच्छेद रूप ही ॥ १४ ॥

उपदेशका उपसंहार और याज्ञवल्क्यका संन्यास

चतुर्ष्वपि प्रपाठकेष्वेक आत्मा तुल्यो निर्धारितः, परं ब्रह्म। उपायविशेषस्तु तस्याधिगमेऽन्यश्चान्यश्च, उपेयस्तु स एवात्मा यश्चतुर्थे 'अथात आदेशो नेति नेति' इति निर्दिष्टः। स एव पञ्चमे प्राणपणोपन्यासेन शाकल्ययाज्ञवल्क्यसंवादे निर्धारितः, पुनः पञ्चमसमाप्तौ, पुनर्जनकयाज्ञवल्क्यसंवादे, पुनरिहोपनिषत्समाप्तौ। चतुर्णामपि प्रपाठकानामेतदात्मनिष्ठता, नान्योऽन्तराले कश्चिदपि विवक्षितोऽर्थः—इत्येतत्प्रदर्शनायान्त उपसंहारः— स एष नेति नेत्यादिः।चारों ही प्रपाठकोंमें एक ही समान आत्माका निश्चय किया गया है; वह परब्रह्म है। किंतु उसके बोधके लिये उपायविशेष भिन्न-भिन्न है, उपेय तो वह आत्मा ही है, जिसका चतुर्थ प्रपाठक [अर्थात् द्वितीय अध्याय] में 'अथात आदेशो नेति नेति' इस प्रकार निर्देश किया है। उसीका पञ्चम प्रपाठक (तृतीय अध्याय) में प्राणरूप पणके उल्लेखद्वारा शाकल्य-याज्ञवल्क्यसंवादमें निश्चय किया गया है; फिर पञ्चम प्रपाठककी समाप्तिमें, तत्पश्चात् जनक-याज्ञवल्क्य-संवादमें और फिर यहाँ उपनिषद्की समाप्तिमें भी उसीका निर्णय किया गया है। इन चारों ही प्रपाठकोंका तात्पर्य इस आत्मामें ही है; इनके बीचमें कोई और अर्थ विवक्षित नहीं है—यह दिखानेके लिये अन्तमें 'स एष नेति नेति' इत्यादि उपसंहार किया गया है।
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