भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 1164, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 1164
११५०बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ४

| तथेहाप्यात्मज्ञानम्; यथा ज्ञाप्यते तथाभूतमेवामृतत्वसाधनमात्मज्ञानमभ्युपगन्तुं युक्तम्; तुल्यप्रामाण्यादुभयत्र । <br><br> यद्येवं किं स्यात् ? <br><br> सर्वकर्महेतूपमर्दकत्वादात्मज्ञानस्य विद्योद्भवे कर्मनिवृत्तिः स्यात् । दाराग्निसम्बद्धानां तावदग्निहोत्रादिकर्मणां भेदबुद्धिविषयसम्प्रदानकारकसाध्यत्वम् । अन्यबुद्धिपरिच्छेद्यां ह्यग्न्यादिदेवतां सम्प्रदानकारकभूतामन्तरेण न हि तत् कर्म निर्वर्त्यते । यया हि सम्प्रदानकारकबुद्ध्या सम्प्रदानकारकं कर्मसाधनत्वेनोपदिश्यते, सेह विद्यया निवर्त्यते— “अन्योऽसावन्योऽहमस्मीति न स 'वेद'” ( बृ० उ० १ । ४ । १०) “देवास्तं परादुर्येऽन्यत्रात्मनो देवान् | उसी प्रकार यहाँ आत्मज्ञान भी समझना चाहिये। जिस प्रकार ज्ञान कराया गया है, उसी प्रकार आत्मज्ञानको अमृतत्वका साधन मानना उचित है; क्योंकि श्रुतिका प्रामाण्य दोनों जगह समान है। <br><br> पूर्व०-यदि ऐसा माना जाय तो इससे क्या सिद्ध होगा ? <br><br> सिद्धान्ती—आत्मज्ञान कर्मके सम्पूर्ण हेतुओंका निवर्तक है, इसलिये ज्ञानोदय होनेपर कर्मकी निवृत्ति हो जायगी। पत्नी और अग्निसे सम्बद्ध जो अग्निहोत्रादि कर्म हैं, वे भेदबुद्धिके विषय ¹सम्प्रदानकारकद्वारा साध्य हैं। अन्य बुद्धिसे परिच्छेद्य एवं सम्प्रदानकारकभूता अग्नि आदि देवताके बिना वह कर्म निष्पन्न नहीं हो सकता और जिस सम्प्रदान-कारक बुद्धिसे सम्प्रदानकारक कर्मके साधनरूपसे उपदेश किया जाता है, वह इस ज्ञानावस्थामें ज्ञानसे निवृत्त हो जाती है; जैसा कि “वह अन्य है मैं अन्य हूँ—ऐसा जो जानता है, वह नहीं जानता”, “जो देवताओंको अपनेसे भिन्न समझता है, देवता उसे परास्त कर देते हैं, |


१. जिसके उद्देश्यसे कुछ दिया जाता है; उसे सम्प्रदानकारक कहते हैं। अग्निसाध्य कर्मोंमें अग्निके उद्देश्यसे आहुति दी जाती है, इसलिये अग्निमें सम्प्रदान-कारकत्व है; अतः वह कर्म सम्प्रदानकारकसाध्य कहा जाता है।