भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 1183, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 1183

ब्राह्मण १] शाङ्करभाष्यार्थ ११६९


| पूर्वापरबाह्याभ्यन्तरभेदविवर्जितं सबाह्याभ्यन्तरमजं नेति नेत्य-स्थूलमनण्वह्रस्वमजरमभयम-मृतम्—इत्येवमाद्याः श्रुतयो निश्चिताथांः संशयविपर्यासाशङ्कारहिताः सर्वाः समुद्रे प्रक्षिप्ताः स्युरकिञ्चित्करत्वात् । <br><br> तथा न्यायविरोधोऽपि सावयवस्यानेकात्मकस्य क्रियावतो नित्यत्वानुपपत्तेः । नित्यत्वं चात्मनः स्मृत्यादिदर्शनादनुमीयते । तद्विरोधश्च प्राप्नोत्यनित्यत्वे, भवत्कल्पनानर्थक्यं च; स्फुटमेव चास्मिन् पक्षे कर्मकाण्डानर्थक्यम्; अकृताभ्यागमकृतविप्रणाशप्रसङ्गात् । <br><br> ननु ब्रह्मणो द्वैताद्वैतात्मकत्वे समुद्रादिदृष्टान्ता विद्यन्ते, कथमुच्यते भवतैकस्य द्वैताद्वैतत्वं विरुद्धमिति । | रसघनस्वरूप निरवकाश तथा पूर्वापर और बाह्याभ्यन्तर भेदसे रहित है' 'सबाह्याभ्यन्तर अज है' 'नेति नेति' 'अस्थूल, अनणु, अह्रस्व, अजर, अभय और अमृत है' इत्यादि श्रुतियां, जो निश्चितार्थ और संशय-विपर्यय एवं शङ्कासे रहित हैं, सारी ही समुद्रमें डाल देनी होंगी; क्योंकि रहकर भी वे कुछ कर नहीं सकतीं । <br><br> इसी प्रकार युक्तिसे भी विरोध आता है; क्योंकि सावयव, अनेकात्मक और क्रियावान् पदार्थका नित्य होना सम्भव नहीं है। और स्मृति आदि देखनेसे आत्माके नित्यत्वका अनुमान होता है। उसका अनित्यत्व माननेपर उस युक्तिसिद्ध नित्यत्वसे विरोध प्राप्त होता है । [ और यदि आत्माका अनित्यत्व स्वीकार भी किया जाय तो भी ] आपकी कल्पना व्यर्थ हो ठहरती है। इस पक्षमें कर्मकाण्डकी व्यर्थता स्पष्ट ही है, क्योंकि [ आत्माको अनित्य माननेपर ] बिना कियेकी प्राप्ति और किये हुएका नाश होने-का प्रसङ्ग उपस्थित होगा । <br><br> पूर्व०-किंतु ब्रह्मके द्वैताद्वैतरूप होनेमें समुद्रादि दृष्टान्त विद्यमान हैं, फिर आप ऐसा कैसे कहते हैं कि एकका द्वैताद्वैतरूप होना विरुद्ध है ? |

बृ० उ० ७४-