बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 1187, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 1187
| ब्राह्मण १] | शाङ्करभाष्यार्थे | ११७३ |
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| संस्कृत (भाष्य) | हिन्दी (भाष्यार्थ) |
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| ऽप्यस्ति, अद्वैतज्ञानावसानत्वाच्छास्त्रशिष्यशासनादिद्वैतभेदस्य । अन्यतमावस्थाने हि विरोधः स्यादवस्थितस्य, इतरेतरापेक्षत्वात्तु शास्त्रशिष्यशासनानां नान्यतमोऽप्यवतिष्ठते । सर्वसमाप्तौ तु कस्य विरोध आशङ्क्येताद्वैते केवले शिवे सिद्धे ? नाप्यविरोधता अत एव । | भी नहीं है; क्योंकि शास्त्र, शिष्य और शासनादि द्वैतभेदकी तो अद्वैतज्ञान होनेपर समाप्ति हो जाती है। यदि इनमेंसे कोई भी रह जाता तो उस रहे हुएका विरोध रहता। किंतु ये शास्त्र, शिष्य और शासन तो एक-दूसरेकी अपेक्षा रखनेवाले हैं, इसलिये इनमेंसे कोई भी स्थित नहीं रहता इस प्रकार सबकी समाप्ति हो जानेपर तो एकमात्र, शिवस्वरूप, नित्यसिद्ध अद्वैतमें किसके विरोधकी आशङ्का की जाय ? और इसीसे उसका किसीसे अविरोध भी नहीं है। |
| अथाप्यभ्युपगम्य ब्रूमः— <br> द्वैताद्वैतात्मकत्वेऽपि शास्त्रविरोधस्य तुल्यत्वात् । यदापि समुद्रादिवद् द्वैताद्वैतात्मकमेकं ब्रह्माभ्युपगच्छामो नान्यद् वस्त्वन्तरम्, तदापि भवदुक्ताच्छास्त्रविरोधान्न मुच्यामहे । | अब हम ब्रह्मको द्वैताद्वैतरूप मानकर भी बतलाते हैं कि उसके द्वैताद्वैतरूप होनेपर भी शास्त्रका विरोध ऐसा ही है। जब हम समुद्रादिके समान द्वैताद्वैतरूप एक ही ब्रह्म स्वीकार करते हैं, उसके सिवा कोई दूसरी वस्तु नहीं मानते उस समय भी हम आपके बतलाये हुए शास्त्रविरोधसे मुक्त नहीं होते ! |
| कथम् ? एकं हि परं ब्रह्म द्वैताद्वैतात्मकं तच्छोकमोहाद्यतीतत्वादुपदेशं न काङ्क्षति । नोपदेष्टा अन्यो ब्रह्मणो द्वैता- | किस प्रकार ? [सो बतलाते हैं-] <br> द्वैताद्वैतरूप एक ही ब्रह्म है, वह शोकमोहादिसे अतीत होनेके कारण उपदेशकी आकांक्षा नहीं रख सकता । इसके सिवा उपदेश करनेवाला भी |