भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 1193, कुल 1402 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1193

ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ११७९


संस्कृत-भाष्यहिन्दी-भाष्यार्थ
प्रतिपद्यते—"एतद्वै सत्यकाम परं चापरं च ब्रह्म यदोङ्कारः” (प्र० उ० ५।२) इति श्रुत्यन्तरात्। केवलं खशब्दार्थे विप्रतिपत्तिः।ही ओङ्कारकी साधनता सिद्ध होती है, जैसा कि "हे सत्यकाम ! यह जो ओङ्कार है यही पर और अपर ब्रह्म है" इस दूसरी श्रुतिसे सिद्ध होता है। यहाँ जो मतभेद है, वह तो 'ख' शब्दके अर्थमें ही है।
वेदोऽयमोङ्कारो वेद विजानात्यनेन यद् वेदितव्यम्। तस्माद् वेद ॐकारो वाचकोऽभिधानम्। तेनाभिधानेन यद् वेदितव्यं ब्रह्म प्रकाश्यमानमभिधीयमानं वेद साधको विजानात्युपलभते। तस्माद् वेदोऽयमिति ब्राह्मणा विदुः। तस्माद् ब्राह्मणानामभिधानत्वेन साधनत्वमभिप्रेतमोङ्कारस्य।यह ओङ्कार वेद है। जो वेदितव्य है, उसका जिससे ज्ञान हो उसे 'वेद' कहते हैं। अतः ओङ्कार वेदवाचक यानी नाम है। उस नामसे जो वेदितव्य-प्रकाशित होनेवाला अर्थात् कहा जानेवाला ब्रह्म है; उसे साधक जानता यानी उपलब्ध करता है। अतः यह वेद हे-ऐसा ब्राह्मण जानते हैं। इसलिये ब्राह्मणोंको यह मान्य है कि ओङ्कार अभिधान (नाम) रूपसे ब्रह्म-साक्षात्कारका साधन है।
अथवा 'वेदोऽयम्' इत्याद्यर्थवादः। कथमोङ्कारो ब्रह्मणः प्रतीकत्वेन विहितः ? ॐ खं ब्रह्मेति सामानाधिकरण्यात् तस्य स्तुतिरिदानीं वेदत्वेन। सर्वो ह्ययं वेद ओङ्कार एव। एतत्प्रभव एतदात्मकः सर्व ऋग्यजुःसामादिभेदभिन्न एष ओङ्कारःअथवा 'वेदोऽयम्' इत्यादि वाक्य अर्थवाद है। किस प्रकार—ओङ्कारका ब्रह्मके प्रतीकरूपसे विधान किया गया है? क्योंकि 'ॐ खं ब्रह्म' इस प्रकार उनका सामानाधिकरण्य है। अब वेदरूपसे उसकी स्तुति की जाती है। यह सारा वेद ओङ्कार ही है। इससे प्रकट होनेवाला और इसीका स्वरूपभूत यह सब ऋक्, यजु और सामरूप भेदोंमें विभिन्न हुआ श्रुतिसमुदाय भी ओङ्कार ही है; जैसा कि