भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 1207, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 1207

ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ ११९३


शाङ्करभाष्यम्भाष्यार्थ
पूज्यं प्रथमजं प्रथमजातं सर्वस्मात् संसारिण एतदेवाग्रे जातं ब्रह्म, अतः प्रथमजम्, वेद विजानाति सत्यं ब्रह्मेति । तस्येदं फलमुच्यते—पूज्य, प्रथमज अर्थात् समस्त संसारियोंसे पहले उत्पन्न हुए—यह ब्रह्म ही सबसे पहले उत्पन्न हुआ था, इसलिये यह प्रथमज है—'यह सत्य ब्रह्म है, इस प्रकार जानता है, उसके लिये यह फल बतलाया जाता है—
यथा सत्येन ब्रह्मणेमे लोका आत्मसात्कृता जिताः, एवं सत्यात्मानं ब्रह्म महद् यक्षं प्रथमजं वेद स जयतीमाँल्लोकान् । किं च जितो वशीकृतः, इन्न्वित्थम्, यथा ब्रह्मणा । असौ शत्रुरिति वाक्यशेषः असञ्च्वासद्- भवेदसौ शत्रुर्जितो भवेदित्यर्थः ।जिस प्रकार सत्य-ब्रह्मके द्वारा ये लोक आत्मसात् किये हुए अर्थात् जीते हुए हैं, इसी प्रकार जो सत्यात्मा प्रथमोत्पन्न, महत्, पूज्य ब्रह्मको जानता है, वह इन लोकोंको जीत लेता है। तथा उसके द्वारा उसका यह शत्रु जित होता—वशीभूत कर लिया जाता है, जिस प्रकार ब्रह्मके द्वारा सब वशीभूत किये हुए हैं। मूलमें 'असौ'के आगे 'शत्रुः' यह वाक्यशेष है। तथा असत् अर्थात् यह शत्रु अभावरूप यानी पराजित हो जाता है।
कस्यैतत् फलमिति पुनर्निगमयति—य एवमेतन्महद् यक्षं प्रथमजं वेद सत्यं ब्रह्मेति, अतो विद्यानुरूपं फलं युक्तम्, सत्यं ह्येव यस्माद् ब्रह्म ॥ १ ॥यह किसका फल है—यह बतलानेके लिये श्रुति पुनः निगमन करती है--जो इस प्रकार इस महत् पूज्य प्रथमजको 'सत्य-ब्रह्म' ऐसा जानता है। अतः उपासनाके अनुरूप फल मिलना उचित ही है, क्योंकि ब्रह्म भी सत्य ही है ॥१॥

इति बृहदारण्यकोपनिषद्भाष्ये पञ्चमाध्याये चतुर्थं सत्यब्राह्मणम् ॥ ४ ॥