बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 1221, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ेंब्राह्मण ९] शाङ्करभाष्यार्थ १२०७
| मनसा ह्यालोचिते विषये वाक्प्रवर्तते; तस्मान्मनो वत्सस्थानीयम्। एवं वाग्धेनूपासकस्तद्भाव्यमेव प्रतिपद्यते ॥ १ ॥ | होती है [यानी पन्हाती है]। मनसे आलोचना किये हुए विषयमें ही वाणीकी प्रवृत्ति होती है, इसलिये मन वत्सस्थानीय है। इस प्रकार वाक्रूपी धेनुका उपासक तद्रूपताको (तदुपाधिक ब्रह्मभावको) ही प्राप्त होता है ॥ १ ॥ |
इति बृहदारण्यकोपनिषद्भाष्ये पञ्चमाध्याये
अष्टमं वाग्धेनुब्राह्मणम् ॥ ८ ॥
नवम ब्राह्मण
पुरुषान्तर्गत वैश्वानराग्नि, उसका घोष और मरणकालका सूचक अरिष्ट
अयमग्निर्वैश्वानरो योऽयमन्तः पुरुषे येनेदमन्नं पच्यते यदिदमद्यते तस्यैष घोषो भवति यमेतत् कर्णावपिधाय शृणोति स यदोत्क्रमिष्यन् भवति नैनं घोषँ शृणोति ॥ १ ॥
जो यह पुरुषके भीतर है, यह अग्नि वैश्वानर है, जिससे कि यह अन्न, जो कि भक्षण किया जाता है, पकाया जाता है। उसीका यह घोष होता है, जिसे पुरुष कानोंको मूँदकर सुनता है। जिस समय पुरुष उत्क्रमण करनेवाला होता है, उस समय इस घोषको नहीं सुनता ॥ १ ॥
| अयमग्निर्वैश्वानरः-पूर्ववदुपासनान्तरम् 'अयमग्निर्वैश्वानरः।' कोऽयमग्निः ? इत्याह—योऽयमन्तः | 'अयमग्निः वैश्वानरः'-पूर्ववत् 'यह अग्नि वैश्वानर है' यह ब्रह्मकी एक अन्य उपासना है। वह अग्नि कौन-सा है? इसपर श्रुति कहती |