बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 1222, कुल 1402 में से
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| १२०८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ५ |
|---|
| संस्कृत-भाष्य | हिन्दी-अनुवाद |
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| पुरुषे । किं शरीरारम्भकः ? <br><br>नेत्युच्यते येनाग्निना वैश्वानराख्येनेदमन्नं पच्यते । किं तदन्नम् ? यदिदमद्यते भुज्यतेऽन्नं प्रजाभिर्जाठरोऽग्निरित्यर्थः । | है—जो कि यह पुरुषके भीतर है, क्या शरीरका आरम्भक अग्नि ? नहीं; कौन-सा है सो बतलाया जाता है—जिस वैश्वानरसंज्ञक अग्निसे यह अन्न पकाया जाता है । वह अन्न कौन-सा है ? जो यह अन्न प्रजाओंन्द्वारा 'अद्यते' भक्षण किया जाता है; [ उस अन्नको पचानेवाला ] अर्थात् जाठराग्नि । |
| तस्य साक्षादुपलक्षणार्थमिदमाह—तस्याग्नेरन्नं पचतो जाठरस्यैष घोषो भवति; कोऽसौ ? यं घोषम्, एतदिति क्रियाविशेषणम्, कर्णावपिधायाङ्गुलीभ्यामपिधानं कृत्वा शृणोति; तं प्रजापतिमुपासीत वैश्वानरमग्निम् । अत्रापि ताद्भाव्यं फलम् । तत्र प्रासङ्गिकमिदमरिष्टलक्षणमुच्यते—सोऽत्र शरीरे भोक्ता यदोत्क्रमिष्यन् भवति नैनं घोषं शृणोति ॥ १ ॥ | उसका साक्षात् उपलक्षण करानेके लिये श्रुति इस प्रकार कहती है—अन्न पचानेवाले उस जाठराग्निका यह घोष होता है; वह कौन-सा है ? जिस घोषको पुरुष दोनों कान मूँदकर अङ्गुलियोंसे ढक करके सुनता है; यहाँ 'एतत्' यह क्रियाविशेषण है; उस प्रजापतिरूप वैश्वानराग्निकी उपासना करे । यहाँ भी तद्रूपताकी प्राप्ति ही फल है । उसमें श्रुति यह प्रसङ्गप्राप्त अरिष्ट बतलाती है—यहाँ शरीरमें वह भोक्ता पुरुष जिस समय उत्क्रमण करनेवाला होता है, उस समय इस घोषको नहीं सुनता ॥ १ ॥ |
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इति बृहदारण्यकोपनिषद्भाष्ये पञ्चमाध्याये
नवमं वैश्वानराग्निब्राह्मणम् ॥ ९ ॥