भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 1226, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 1226
१२१२बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ५

व्याधियुक्त पुरुषको जो ताप होता है—यह निश्चय ही परम तप है, जो ऐसा जानता है, वह परम लोकको ही जीत लेता है। मृत पुरुषको जो वनको ले जाते हैं, यह निश्चय ही परम तप है; जो ( म्रियमाण व्यक्ति ) ऐसा जानता है, वह परम लोकको ही जीत लेता है। मरे हुए मनुष्यको सब प्रकार जो अग्निमें रखते हैं, यह निश्चय ही परम तप है; जो ऐसा जानता है, वह परम लोकको ही जीत लेता है ॥ १ ॥

संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
एतद् वै परमं तपः । किं तत् ? यद् व्याहितो व्याधितो ज्वरादिपरिगृहीतः सन् यत् तप्यते तदेतत् परमं तप इत्येवं चिन्तयेत्; दुःखसामान्यात् । तस्यैवं चिन्तयतो विदुषः कर्मक्षयहेतुस्तदेव तपो भवत्यनिन्दतोऽविषीदतः; स एव च तेन विज्ञानतपसा दग्धकिल्बिषः परमं हैव लोकं जयति य एवं वेद ।<br><br>तथा मुमूर्षुरादावेव कल्पयति; किम् ? एतद् वै परमं तपो यं प्रेतं मां ग्रामादरण्यं हरन्ति ऋत्विजोऽन्त्यकर्मणे तद् ग्रामादरण्यगमनसामान्यात् परमं मम तत् तपोयह निश्चय परम तप है। वह क्या है ? व्याहित-व्याधित अर्थात् ज्वरादिसे ग्रस्त हुआ पुरुष जो ताप होता है, यह परम तप है—ऐसा चिन्तन करे; क्योंकि ताप और तप इनमें समान ही क्लेश है। इस प्रकार चिन्तन करनेवाले उस विद्वान्‌का, जो कि स्वतः प्राप्त हुए रोगादिकी निन्दा नहीं करता तथा उससे विषादको प्राप्त नहीं होता, वही तप कर्मक्षयका हेतु हो जाता है। जो इस प्रकार जानता है, वह उस विज्ञानरूप तपके द्वारा पापोंको दग्ध करके परम लोकपर विजय प्राप्त कर लेता है।<br><br>इसी प्रकार मरणासन्न पुरुष आरम्भमें ही कल्पना करता है; क्या कल्पना करता है ? मर जानेपर मुझे ऋत्विगगण अन्त्येष्टिकर्मके लिये जो ग्रामसे वनमें ले जायँगे, यह निश्चय ही परम तप होगा—ग्रामसे वन-गमनमें समानता होनेके कारण वह मेरा परम तप हो जायगा। यह