भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 1227, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 1227
ब्राह्मण १२ ]शाङ्करभाष्यार्थ१२१३

| भविष्यति । ग्रामादरण्यगमनं परमं तप इति हि प्रसिद्धम् । परमं हैव लोकं जयति य एवं वेद ।<br><br>तथैतद्वै परमं तपो यं प्रेतमग्नावभ्यादधति; अग्निप्रवेशसामान्यात्, परमं हैव लोकं जयति य एवं वेद ॥ १ ॥ | तो प्रसिद्ध ही है, कि ग्रामसे वनमें जाना परम तप है। जो ऐसा जानता है, वह निश्चय ही परम लोकको जीत लेता है ।<br><br>तथा जिस मृतकको सब ओरसे अग्निमें रखते हैं—यह भी उसके लिये परमतप होता है, क्योंकि अग्निप्रवेशसे इसकी समानता है । जो ऐसा जानता है, वह निश्चय ही परम् लोकको जीत लेता है ॥ १ ॥ |

इति बृहदारण्यकोपनिषद्भाष्ये पञ्चमाध्याये एकादशं तपोब्राह्मणम् ॥ ११ ॥


द्वादश ब्राह्मण

अन्न-प्राणरूप ब्रह्मकी उपासना और तद्विषयक आख्यान

अन्नं ब्रह्मेति—तथैतदुपासनान्तरं विधित्सन्नाह—'अन्नं ब्रह्म'—इस प्रकार इस अन्य उपासनाका विधान करनेकी इच्छासे वेद कहता है—

अन्नं ब्रह्मेत्येक आहुस्तन्न तथा पूयति वा अन्नमृते प्राणात् प्राणो ब्रह्मेत्येक आहुस्तन्न तथा शुष्यति वै प्राण ऋतेऽन्नादेते ह त्वेव देवते एकधाभूयं भूत्वा परमतां गच्छतस्तद्ध स्माह प्रातृदः पितरं किं स्विदेवैवंविदुषे साधु कुर्यां कमेवास्मा असाधु