बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 1234, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें| १२२० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ५ |
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| भावस्तस्मै श्रैष्ठ्याय श्रेष्ठभावायायं नः श्रेष्ठो भवेदिति । यजुषः प्राणस्य सायुज्यमित्यादि सर्वं समानम् ॥ २ ॥ | श्रैष्ठ्य-श्रेष्ठभावका नाम श्रेष्ठ्य है, उस श्रैष्ठ्य यानी श्रेष्ठ-भावके लिये—यह हममें श्रेष्ठ हो, इस निमित्तसे युक्त होते अर्थात् उद्यम करते हैं। तथा वह यजुरूप प्राणका सायुज्य प्राप्त करता है—इत्यादि सब अर्थ पूर्ववत् है ॥ २ ॥ |
सामदृष्टिसे प्राणोपासना
साम प्राणो वै साम प्राणे हीमानि सर्वाणि भूतानि सम्यञ्चि सम्यञ्चि हास्मै सर्वाणि भूतानि श्रैष्ठ्याय कल्पन्ते साम्नः सायुज्यँ सलोकतां जयति य एवं वेद ॥ ३ ॥
'साम' इस प्रकार प्राणकी उपासना करे। प्राण ही साम है, क्योंकि प्राणमें ही ये सब भूत सुसंगत होते हैं। समस्त भूत उसके लिये सुसंगत होते हैं तथा उसकी श्रेष्ठताके लिये समर्थ होते हैं। जो इस प्रकार उपासना करता है, वह सामके सायुज्य और सलोकताको प्राप्त होता है ॥ ३ ॥
| सामेति चोपासीत प्राणम् । प्राणो वै साम । कथं प्राणः साम ? प्राणे हि यस्मात् सर्वाणि भूतानि सम्यञ्चि संगच्छन्ते; संगमनात् साम्यापात्तहेतुत्वात् साम प्राणः। सम्यञ्चि संगच्छन्ते हास्मै सर्वाणि भतानि। न केवलं संगच्छन्त एव, श्रेष्ठ भावाय चास्मै कल्पन्ते समर्थ्यन्ते साम्नः सायुज्यमित्यादि पूर्ववत् ॥ ३ ॥ | 'साम' इस प्रकार भी प्राणकी उपासना करे। प्राण ही साम है। प्राण साम किस प्रकार है ? क्यों-कि प्राणमें ही सब भूत संगत होते हैं; सङ्गमन अर्थात् साम्यप्राप्तिके कारण प्राण साम है। सम्पूर्ण भूत उसके साथ संगत हो जाते हैं; केवल संगत ही नहीं होते, इसके श्रेष्ठभावके लिये भी समर्थ होते हैं। सामके सायुज्यको प्राप्त होता है—इत्यादि अर्थ पूर्ववत् है ॥ ३ ॥ |