बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 1235, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 1235
ब्राह्मण १३] शाङ्करभाष्यार्थ १२२१
क्षत्रदृष्टिसे प्राणोपासना
क्षत्रं प्राणो वै क्षत्रं प्राणो हि वै क्षत्रं त्रायते हैनं प्राणः क्षणितोः प्र क्षत्रमत्रमाप्नोति क्षत्रस्य सायुज्यँ सलोकतां जयति य एवं वेद ॥ ४ ॥
प्राण क्षत्र है—इस प्रकार प्राणकी उपासना करे। प्राण ही क्षत्र है। प्राण ही क्षत्र है—यह प्रसिद्ध है। प्राण इस देहकी शस्त्रादिजनित क्षतसे रक्षा करता है। अत्रम्—अन्य किसोसे त्राण न पानेवाले क्षत्र (प्राण) को प्राप्त होता है। जो इस प्रकार उपासना करता है, वह क्षत्रके सायुज्य और सलोकताको जीत लेता है ॥ ४ ॥
| संस्कृत-भाष्य | हिन्दी-अनुवाद |
|---|---|
| तं प्राणं क्षत्रमित्युपासीत । प्राणो वै क्षत्रं प्रसिद्धमेतत् प्राणो हि वै क्षत्रम् । कथं प्रसिद्धता ? इत्याह—त्रायते पालयत्येनं पिण्डं देहं प्राणः क्षणितोः शस्त्रादिहिंसितात् पुनर्मांसेनापूरयति यस्मात् तस्मात् क्षतत्राणात् प्रसिद्धं क्षत्रत्वं प्राणस्य । | उस प्राणकी 'क्षत्र' इस प्रकार उपासना करे। प्राण ही क्षत्र है—यह प्रसिद्ध है कि प्राण ही क्षत्र है। यह प्रसिद्ध किस कारण है, सो श्रुति बतलाती है—इस पिण्ड यानी शरीरकी प्राण क्षतसे—शस्त्रादिकी पीडासे रक्षा करता है अर्थात् उसे पुनः मांससे भर देता है, अतः क्षतसे रक्षा करनेके कारण प्राणका क्षत्रत्व प्रसिद्ध है। |
| विद्वत्फलमाह—प्र क्षत्रमत्रं न त्रायतेऽन्येन केनचिदित्यत्रं क्षत्रं प्राणस्तमत्रं क्षत्रं प्राणं प्राप्नोतीत्यर्थः । शाखान्तरे वा पाठात् क्षत्रमात्रं प्राप्नोति प्राणो | अब श्रुति उपासकको मिलनेवाला फल बतलाती है—प्र क्षत्रम् अत्रम्—जिसका किसी दूसरेसे त्राण नहीं किया जाता, वह प्राण 'अत्र-क्षत्र' है, उस अत्र क्षत्ररूप प्राणको प्राप्त होता है। शाखान्तर (माध्यन्दिनी शाखा) में २पाठान्तर होनेके कारण क्षत्रमात्रको प्राप्त होता है अर्थात् प्राण |
१. त्राणहीन।
२. वहाँ 'प्र क्षत्रमत्रमाप्नोति' के स्थानमें 'प्र क्षत्रमात्रमाप्नोति' ऐसा पाठान्तर है।