बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 1244, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें| १२३० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ५ | | :--- | :--- |
| चक्षुः सत्यमित्याह—प्रसिद्धमेतच्चक्षुर्हि वै सत्यम्। कथं प्रसिद्धता ? इत्याह—तस्मात् यद् यदीदानीमेव द्वौ विवदमानौ विरुद्धं वदमानावियातामागच्छेयातामहमदर्शं दृष्टवानस्मीत्यन्य आहाहमश्रौषं त्वया दृष्टं न तथा तद्वस्त्विति तयोर्य एवं ब्रूयादहमद्राक्षमिति तस्मै एव श्रद्दध्याम न पुनर्यो यादहमश्रौषमिति। श्रोतुर्मृषा श्रवणमपि संभवति न तु चक्षुषो मृषा दर्शनम्; तस्मान्नाश्रौषमित्युक्तवते श्रद्दध्याम। तस्मात् सत्यप्रतिपत्तिहेतुत्वात् सत्यं चक्षुस्तस्मिन् सत्ये चक्षुषि सह त्रिभिरितरैः पादैस्तुरीयं पदं प्रतिष्ठितमित्यर्थः। उक्तं च "स आदित्यः कस्मिन् प्रतिष्ठित इति चक्षुषीति" (३।९।२०)। | प्रकार चक्षु सत्य है? सो श्रुति बतलाती है। यह बात प्रसिद्ध है कि चक्षु ही सत्य है। ऐसी प्रसिद्धि क्यों है? सो श्रुति बतलाती है— इसलिये, यदि इसी समय दो विवाद करनेवाले—परस्परविरुद्ध बोलनेवाले आवें; उनमेंसे एक कहता हो, कि 'मैंने ऐसा देखा है' और दूसरा कहे कि 'मैंने सुना है, तूने जैसी देखी है, वह वस्तु वैसी नहीं है' तो उनमेंसे जो यह कहेगा कि 'मैंने उसे देखा है' हम उसीका विश्वास करेंगे, जो ऐसा कहता है कि 'मैंने सुना है' उसका नहीं। सुननेवालेका श्रवण तो मिथ्या भी हो सकता है, किंतु नेत्रोंको मिथ्या दर्शन नहीं हो सकता। इसलिये जो कहता है कि 'मैंने सुना है' उसमें हमारा विश्वास नहीं होता। अतः सत्यज्ञानका हेतु होनेके कारण चक्षु सत्य है। उस सत्यरूप चक्षुमें अन्य तीन पादोंके सहित तुरीय पद प्रतिष्ठित है—ऐसा इसका तात्पर्य है। कहा भी है—"वह आदित्य किसमें प्रतिष्ठित है? चक्षुमें"। | | तद् वै तुरीयपदाश्रयं सत्यं बले प्रतिष्ठितम्। किं पुनस्तद्बलम् ? | वह तुरीय पदका आश्रयभूत सत्य बलमें प्रतिष्ठित है। वह बल क्या |