भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 1245, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 1245

ब्राह्मण १४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १२३१


| इत्याह—प्राणो वै बलं तस्मिन् प्राणे बले प्रतिष्ठितं सत्यम् । तथा चोक्तम् "सूत्रे तदोतं च प्रोतं च" इति । यस्माद् बले सत्यं प्रतिष्ठितं तस्मादाहुः—बलं सत्यादोगीय ओजीय ओजस्तरमित्यर्थः । लोकेऽपि यस्मिन् हि यदाश्रितं भवति तस्मादाश्रितादाश्रयस्य बलवत्त्वं प्रसिद्धम्; न हि दुर्बलं बलवतः क्वचिदाश्रयभूतं दृष्टम् । | हे ? सो श्रुति बतलाती है—प्राण ही बल है । उस प्राणरूप बलमे सत्य प्रतिष्ठित है । ऐसा ही कहा भी है कि "उस सूत्रमें [सूत्रसंज्ञक प्राणमें] यह [ सत्यसंज्ञक भूतसमुदाय ] ओतप्रोत है।" क्योंकि बलमें सत्य प्रतिष्ठित है, इसलिये कहा है कि सत्यकी अपेक्षा बल ओगीय—ओजीय अर्थात् अधिक ओजस्वी है। लोकमें भी जो वस्तु जिसमें आश्रित होती है, उसकी अपेक्षा उस आश्रयका अधिक बलवान् होना प्रसिद्ध है। कहीं भी दुर्बल बलवान्‌का आश्रयभूत नहीं देखा गया । | | एवमुक्तन्यायेन उ एषा गायत्र्यध्यात्ममध्यात्म प्राण प्रतिष्ठा । सैषा गायत्री प्राणः, अतो गायत्र्यां जगत्प्रतिष्ठितम् । यस्मिन् प्राणे सर्वे देवा एकं भवन्ति, सर्वे वेदाः कर्माणि फलं च सैवं गायत्री प्राणरूपा सती जगत आत्मा । | इस प्रकार उक्त न्यायसे यह गायत्री अध्यात्म—शरीरस्थ प्राणमें प्रतिष्ठित है । वह यह गायत्री प्राण है, इसलिये गायत्रीमें जगत् प्रतिष्ठित है । जिस प्राणमें सम्पूर्ण देव एक हो जाते हैं तथा समस्त वेद, कर्म और फल भी जिसमें एक हो जाते हैं,वह गायत्री इस प्रकार प्राणरूपा होनेके कारण जगत्की आत्मा है । | | सा हैषा गयांस्तत्रे त्रातवती; के पुनर्गयाः ? प्राणा वागादयो वै गयाः; शब्दकरणात्; तांस्तत्रे सैषा गायत्री; तत्तत्र यद्यस्माद् | उस इस गायत्रीने गयोंका त्राण किया था। वे गय कौन हैं ? वागादि प्राण ही गय हैं, क्योंकि वे शब्द करते हैं। इस गायत्रीने उनका त्राण किया था । इस प्रकार चूँकि इसने |