भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 1261, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 1261

षष्ठ अध्याय

प्रथम ब्राह्मण

संस्कृत भाष्यहिन्दी अनुवाद
ॐ प्राणो गायत्रीत्युक्तम् । कस्मात् पुनः कारणात् प्राणभावो गायत्र्या न पुनर्वागादिभाव इति? यस्माज्ज्येष्ठश्च श्रेष्ठश्च प्राणः; न वागादयो ज्येष्ठ्यश्रेष्ठ्यभाजः । कथं ज्येष्ठत्वं श्रेष्ठत्वं च प्राणस्येति तन्निर्दिधारयिषयेदमारभ्यते ।<br><br>अथवोक्थयजुःसामक्षत्रादिभावैः प्राणस्यैवोपासनमभिहितं सत्स्वप्यन्येषु चक्षुरादिषु । तत्र हेतुमात्रमिहानन्तर्येण सम्बध्यते । न पुनः पूर्वशेषता । विवक्षितं तु खिलत्वादस्य काण्डस्य पूर्वत्र यदनुक्तं विशिष्टफलं प्राणविषयमुपासनं तद् वक्तव्यमिति ।ॐ प्राण गायत्री है—ऐसा पहले कहा जा चुका है । किंतु गायत्रीका प्राणभाव ही किस कारणसे है, वागादिभाव क्यों नहीं है ? क्योंकि प्राण ज्येष्ठ और श्रेष्ठ है, वागादि ज्येष्ठता और श्रेष्ठताके पात्र नहीं हैं । प्राणका ज्येष्ठत्व और श्रेष्ठत्व क्यों है—इसका निश्चय करनेकी इच्छासे यह [आगे-का ग्रन्थ आरम्भ किया जाता है ।<br><br>अथवा उक्थ, यजुः, साम, क्षत्रादि भावोंसे चक्षु आदि अन्य इन्द्रियोंके रहते हुए भी प्राणकी ही उपासना बतलायी गयी है । यहाँ उसका हेतुमात्र है, जो उसके अनन्तर होनेके कारण उससे सम्बन्ध रखता है । यह पूर्व ग्रन्थका शेष नहीं है । इसका विवक्षित विषय विशिष्टफलवती प्राणोपासना ही है । यह काण्ड उसका खिलस्वरूप होनेके कारण जो पूर्वग्रन्थमें नहीं कहा गया, उसीको यहाँ बतलाना है ।