भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 1274, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 1274
१२६०बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ६

प्राणके उत्क्रमण करते ही अन्य इन्द्रियोंका विचलित हो जाना और उसकी श्रेष्ठता स्वीकार करना

अथ ह प्राण उत्क्रमिष्यन् यथा महासुहयः सैन्धवः पड्वीशशङ्कून् संवृहेदेवँ हैवेमान् प्राणान् संववर्ह ते होचुर्मा भगव उत्क्रमीर्न वै शक्ष्यामस्त्वदृते जीवितुमिति तस्यो मे बलिं कुरुतेति तथेति ॥ १३ ॥

फिर प्राण उत्क्रमण करने लगा, तो जिस प्रकार सिन्धुदेशीय महान् अश्व पैर बांधनेके खूँटोंको उखाड़ डालता है, उसी प्रकार वह इन सब प्राणोंको स्थानच्युत करने लगा। उन्होंने कहा, 'भगवन् ! आप उत्क्रमण न करें, आपके बिना हम जीवित नहीं रह सकते।' प्राणने कहा, 'अच्छा तो मुझे बलि (भेंट) दिया करो।' [अन्य इन्द्रियोंने कहा—] 'बहुत अच्छा' ॥ १३ ॥

अथ ह प्राण उत्क्रमिष्यन्नु-फिर प्राण 'उत्क्रमिष्यन्'—
त्क्रमणं करिष्यंस्तदानीमेव स्वस्था-उत्क्रमण करने लगा। उसी समय
नात् प्रचलिता वागादयः।वागादि प्राण अपने स्थानसे
किमिव ? इत्याह—यथा लोकेचलायमान हो गये। किसके
महांश्चासौ सुहयश्च महासुहयःसमान ? यह बतलाते हैं—जिस
शोभनो हयो लक्षणोपेतो महान्प्रकार लोकमें महासुहयः—जो
परिमाणतः सिन्धुदेशे भवःमहान् हो और सुहय—शोभन हय
सैन्धवोऽभिजनतः पड्वीशशङ्-अर्थात् सुलक्षण-सम्पन्न अश्व
कून् पादबन्धनशङ्कून् पड्वी-(घोड़ा) हो तथा परिमाणतः महान्
शाश्च ते शङ्कवश्च तान् संवृहे-हो एवं सैन्धव'—सिन्धुदेशमें उत्पन्न
हुआ अर्थात् उत्तम जातिका हो, वह
जिस प्रकार परीक्षाके लिये सवारके
चढ़ते ही पड्वीश शङ्कुओंको—पैर
बाँधनेके खूँटोंको—जो पड्वीश हों
और शङ्कु हों, उनको संवृहेत्—