भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 1287, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 1287

ब्राह्मण २] शाङ्करभाष्यार्थ १२७३


| लक्षणस्य कर्मणः फलम् । न हि कर्तारमनाश्रित्याहुतिलक्षणस्य कर्मणः स्वातन्त्र्येणोत्क्रान्त्यादिकार्यारम्भ उपपद्यते । कर्तृर्थत्वात् कर्मणः कार्यारम्भस्य, साधनाश्रयत्वाच्च कर्मणः ।<br><br>तत्राग्निहोत्रस्तुत्यर्थत्वादग्निहोत्रस्यैव कार्यमित्युक्तं षट्प्रकारमपि; इह तु तदेव कर्तुः फलमित्युपदिश्यते षट्प्रकारमपि; कर्मफलविज्ञानस्य विवक्षितत्वात् । तद्वारेण च पञ्चाग्निदर्शनमिहोत्तरमार्गप्रतिपत्तिसाधनं विधित्सितम्; एवमशेषसंसारगत्युपसंहारः, कर्मकाण्डस्यैषा निष्ठेत्येतद् द्वयं दिदर्शयिषुस्राख्यायिकां प्रणयति— | आहुतिरूप कर्मका फल है, क्योंकि कर्ताका आश्रय लिये बिना आहुतिरूप कर्मका स्वतन्त्रतासे उत्क्रान्ति आदि कार्य आरम्भ करना सम्भव नहीं है; कारण, कर्मका कार्यारम्भ तो कर्ताके लिये ही होता है तथा कर्म साधनाधीन भी होता ही है।<br><br>किंतु वहाँ वह [ जनक-याज्ञवल्क्यसंवाद ] अग्निहोत्रकी स्तुतिके लिये होनेके कारण यह छहों प्रकारका अग्निहोत्रका ही कार्य बतलाया गया है। किंतु यहाँ कर्मफलविज्ञान विवक्षित होनेके कारण यह बतलाया जाता है, कि वह छहों प्रकारका कर्ताका ही फल है। उसके द्वारा ही यहाँ उत्तरमार्गकी प्राप्तिकी साधनभूता पञ्चाग्निविद्याका विधान करना अभीष्ट है। इस प्रकार यह सम्पूर्ण संसारगतिका उपसंहार है और यही कर्मकाण्डकी निष्ठा है—इन दो बातोंको दिखानेके लिये श्रुति आख्यायिका रचती है— |


प्रवाहणकी सभामें श्वेतकेतुका आना और प्रवाहणका उससे प्रश्न करना

श्वेतकेतुर्ह वा आरुणेयः पञ्चालानां परिषदमाजगाम स आजगाम जैवलिं प्रवाहणं परिचारयमाणं