बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 1288, कुल 1402 में से
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| १२७४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ६ |
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तमुदीक्ष्याभ्युवाद कुमारा ३ इति स भो ३ इति प्रतिशुश्रावानुशिष्टोऽन्वसि पित्रेत्योमिति होवाच ॥ १॥
प्रसिद्ध है कि आरुणिका पुत्र श्वेतकेतु पाञ्चालोंकी सभामें आया । वह जीवलके पुत्र प्रवाहणके पास पहुँचा, जो [सेवकोंसे] परिचर्या करा रहा था ! उसे देखकर प्रवाहणने कहा, 'ओ कुमार !' वह बोला 'भो !' [ प्रवाहणने पूछा—] 'क्या तेरे पिताने तुझे शिक्षा दी है ?' तब श्वेतकेतुने 'हाँ' ऐसा उत्तर दिया ॥ १॥
| श्वेतकेतुर्नामतॊऽरुणस्यापत्य-मारुणिस्तस्यापत्यमारुणेयः, ह-शब्द ऐतिह्यार्थः, वै निश्चयार्थः, पित्रानुशिष्टः सन्नात्मनो यशः-प्रथनाय पञ्चालानां परिषदमाज-गाम। पञ्चालाः प्रसिद्धास्तेषां परिषदमागत्य जित्वा राज्ञोऽपि परिषदं जेष्यामीति गर्वेण स आजगाम । जीवस्यापत्यं जैवत्विं पञ्चालराजं प्रवाहणना-मानं स्वभृत्यैः परिचारयमाण-मात्मनः परिचरणं कारयन्त-मित्येतत् । | जो नामसे श्वेतकेतुथा, वह आरुणेय—अरुणका पुत्र आरुणि, उसका पुत्र आरुणेय, 'ह' शब्द इतिहासका द्योतक है और 'वै' निश्चयार्थक है; पितासे शिक्षा पाकर अपना यश फैलानेके लिये पाञ्चालोंकी सभामें आया । पाञ्चाल-देशीय विद्वान् प्रसिद्ध हैं, उनकी सभामें आकर उन्हें जीतकर फिर राजाकी सभाको भी जीत लूँगा—इस प्रकार वह गर्वसे वहाँ गया था । वह जीवलके पुत्र जैवत्वि प्रवाहण नामक पाञ्चालराजके पास पहुँचा, जो अपने सेवकोंसे परिचारण अर्थात् अपनी परिचर्या (सेवा) करा रहा था । |
| स राजा पूर्वमेव तस्य विद्या-भिमानगर्वं श्रुत्वा विनेतव्योऽय-मिति मत्वा तमुद्वीक्ष्योत्प्रेक्ष्या- | उस राजाने पहलेसे ही उसके विद्याभिमान और गर्वके विषयमें सुन कर यह विचारते हुए कि इसे विनीत करना चाहिये, उसे देखकर आते |