भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 1293, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 1293

ब्राह्मण २] शाङ्करभाष्यार्थ १२७७


शाङ्करभाष्यम्भाष्यानुवाद
पत्तिः। यथा ताः प्रजा विप्रतिपद्यन्ते तत् किं वेत्थेत्यर्थः। नेति होवाचेतरः।प्रकार उस प्रजाकी विभिन्न गति होती है, वह क्या तू जानता है?' इसपर इतर (श्वेतकेतु) ने कहा—'नहीं।'
तर्हि वेत्थ उ यथेमं लोकं पुनरापद्यन्ता३ इति पुनरापद्यन्ते यथा पुनरागच्छन्तीमं लोकम्? नेति हैवोवाच श्वेतकेतुः। वेत्थो यथासौ लोक एवं प्रसिद्धेन न्यायेन पुनः पुनरसकृत् प्रयद्भिर्म्रियमाणैर्यथा येन प्रकारेण न संपूर्यता३ इति न संपूर्यतेऽसौ लोकस्तत्किं वेत्थ? नेति हैवोवाच।'तो फिर, जिस प्रकार प्रजा पुनः इस लोकको प्राप्त होती है—पुनः इस लोकमें आती है, वह क्या तू जानता है?' श्वेतकेतुने कहा 'नहीं।' 'तो क्या तू जानता है कि इस प्रकार—इस प्रसिद्ध न्यायसे प्रजाके पुनः-पुनः निरन्तर मरते रहनेपर भी वह लोक कैसे—किस प्रकारसे नहीं भरता? अर्थात् जिस प्रकार वह लोक नहीं भरता, सो क्या तुझे मालूम है?' इसपर भी श्वेतकेतुने 'नहीं' ऐसा कहा।
वेत्थो यतिथ्यां यत्संख्याकायामाहुत्यामाहुतौ हुतायामापः पुरुषवाचः पुरुषस्य या वाक् सैव यासां वाक् ता पुरुषवाचो भूत्वा पुरुषशब्दवाच्या वा भूत्वा, यदा पुरुषाकारपरिणतास्तदा पुरुषवाचो भवन्ति, समुत्थाय सम्यगुत्थायोद्भूताः सत्यो वदन्ती३ इति? नेति हैवोवाच।'क्या तू जानता है कि 'यतिथ्याम्'—जितनी संख्यावाली आहुतिके हवन किये जानेपर आप (जल) पुरुषवाक्—पुरुषकी जो वाक् है, वही जिसकी वाक् है, इस प्रकार पुरुषवाक् होकर अथवा 'पुरुष' शब्दवाच्य होकर—जिस समय वह पुरुषाकारमें परिणत होता है, उस समय पुरुषवाक् होता है—'समुत्थाय'—सम्यक् प्रकारसे उठकर बोलता है?' श्वेतकेतुने 'नहीं' ऐसा कहा।