बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 1313, कुल 1402 में से
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ब्राह्मण २ ] शाङ्करभाष्यार्थ १२९७
| अग्निर्धूमः; पृथिव्याश्रयोत्थानसामान्यात्; पार्थिवं हीन्धनद्रव्यमाश्रित्याग्निरुत्तिष्ठति, यथा समिदाश्रयेण धूमः । | अग्नि धूम है; क्योंकि पृथिवीरूप आश्रयसे उठनेमें इनकी समानता है; क्योंकि पार्थिव ईंधन द्रव्यको आश्रय करके ही अग्नि उठती है, जिस प्रकार कि समिधके आश्रयसे धूम उठता है । |
| रात्रिरर्चिः, समित्सम्बन्धप्रभवसामान्यात्, अग्नेः समित्सम्बन्धेन ह्यर्चिः संभवति । तथा पृथिवीसमित्सम्बन्धेन शर्वरी, पृथिवीछायां हि शार्वरं तम आचक्षते । | रात्रि ज्वाला है, समिधके सम्बन्धसे उत्पन्न होनेमें इनकी समानता है; क्योंकि अग्निसे समिधका सम्बन्ध होनेसे ही ज्वाला उत्पन्न होती है और इसी प्रकार पृथिवीरूप समिधके सम्बन्धसे रात्रि होती है; पृथिवीकी छायाको ही रात्रिका अन्धकार कहते हैं । |
| चन्द्रमा अङ्गाराः, तत्प्रभवत्वसामान्यात् । अर्चिषो ह्यङ्गाराः प्रभवन्ति तथा रात्रौ चन्द्रमा उपशान्तत्वसामान्याद् वा । | चन्द्रमा अङ्गार है; क्योंकि ज्वालासे उत्पन्न होनेमें इनकी समानता है । ज्वालासे ही अङ्गारे होते हैं, इसी प्रकार रात्रिमें चन्द्रमा होता है । अथवा उपशान्तत्वमें समानता होनेके कारण चन्द्रमा अङ्गार है । |
| नक्षत्राणि विस्फुलिङ्गाः, विस्फुलिङ्गवद् विक्षेपसामान्यात् । | नक्षत्र विस्फुलिङ्ग हैं, क्योंकि विस्फुलिङ्गोंके समान इधर-उधर बिखरे रहनेमें इनकी भी समानता है । |
| तस्मिन्नेतस्मिन्नित्यादि पूर्ववत्। | 'तस्मिन्नेतस्मिन्' इत्यादि वाक्यका अर्थ पूर्ववत् है । |
| वृष्टिं जुह्वति तस्या आहुतेरन्नं | इसमें वृष्टिको होमते हैं, उस आहुतिसे अन्न होता है; |
बृ० उ०—८२