बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 1315, कुल 1402 में से
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ब्राह्मण २] शाङ्करभाष्यार्थ १२९९
| चक्षुरङ्गाराः, उपशमसामान्यात् प्रकाशाश्रयत्वाद् वा । श्रोत्रं विस्फुलिङ्गाः, विक्षेपसामान्यात् ।<br><br>तस्मिन्नन्नं जुह्वति ।<br><br> ननु नैव देवा अन्नमिह जुह्वतो दृश्यन्ते ?<br><br> नैष दोषः, प्राणानां देवत्वोपपत्तेः। अधिदैवमिन्द्रादयो देवास्त एवाध्यात्मं प्राणास्ते चान्नस्य पुरुषे प्रक्षेप्सारः ।<br><br> तस्या आहुते रेतः संभवति; अन्नपरिणामो हि रेतः ॥१२॥ | उपशममें समानता होनेके कारण अथवा प्रकाशके आश्रय होनेके कारण नेत्र अङ्गार हैं। विक्षेपमें समानता होनेके कारण श्रोत्र विस्फुलिङ्ग हैं। इस पुरुषरूप अग्निमें अन्न होम करते हैं।<br><br> **शङ्का—**किंतु देवगण इसमें अन्न होम करते देखे तो नहीं जाते ?<br><br> **समाधान—**यह दोष नहीं है; क्योंकि प्राणोंको देव माना जा सकता है। जो अधिदैव इन्द्रादि देव हैं, वे ही अध्यात्म प्राण हैं, वे ही पुरुषमें अन्न डालनेवाले हैं।<br><br> उस आहुतिसे वीर्य होता है; क्योंकि वीर्य अन्नका ही परिणाम है ॥ १२ ॥ |
५–योषाग्नि
योषा वा अग्निर्गौतम तस्या उपस्थ एव समि- ल्लोमानि धूमो योनिरर्चिर्यदन्तः करोति तेऽङ्गारा अभिनन्दा विस्फुलिङ्गास्तस्मिन्नेतस्मिन्नग्नौ देवा रेतो जुह्वति तस्या आहुत्यै पुरुषः संभवति स जीवति यावज्जीवत्यथ यदा म्रियते ॥ १३ ॥
हे गौतम ! स्त्री ही अग्नि है। उपस्थ ही उसकी समिध् है, लोम धूम है, योनि ज्वाला है, जो भीतरको [ मैथुनव्यापार ] करता है, वह अङ्गार है, आनन्दलेश विस्फुलिङ्ग हैं। उस इस अग्निमें देवगण वीर्य