बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 1327, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें| ब्राह्मण २ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | १३११ |
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| तत्र युक्तो निरर्थकत्वेनोत्स्रष्टुं विशेषणशब्दो न तु सत्यां विशेषणफलावगतौ । तस्मादस्मात्कल्पादूर्ध्वमावृत्तिर्गम्यते ॥१५॥ | वहां व्यर्थ होनेके कारण उस विशेषणका परित्याग कर देना ही उचित है, विशेषणके फलका बोध होनेपर उसको त्यागना उचित नहीं है। इसलिये [ 'इस संसारमें' ऐसा विशेषण लगानेके कारण ] यह सूचित होता है कि इस कल्पके बाद उसकी पुनरावृत्ति हो सकती है ॥१५॥¹ |
धूमयानमार्गका वर्णन तथा द्वितीय और तृतीय प्रश्नका उत्तर
अथ ये यज्ञेन दानेन तपसा लोकाञ्जयन्ति ते धूममभिसंभवन्ति धूमाद्रात्रिँ रात्रेरपक्षीयमाणपक्षमपक्षीयमाणपक्षाद् यान् षण्मासान् दक्षिणादित्य एति मासेभ्यः पितृलोकं पितृलोकाच्चन्द्रं ते चन्द्रं प्राप्यान्नं भवन्ति ताँस्तत्र देवा यथा सोमँ राजानमाप्यायस्वापक्षीयस्वेत्येवमेनाँस्तत्र भक्षयन्ति तेषां यदा तत् पर्यवैत्यथेममेवाकाशमभिनिष्पद्यन्त आकाशाद् वायुं वायोर्वृष्टिं वृष्टेः पृथिवीं ते पृथिवीं प्राप्यान्नं भवन्ति ते पुनः पुरुषाग्नौ हूयन्ते ततो योषाग्नौ जायन्ते लोकान् प्रत्युत्थायिनस्त
१. यहाँ जो ब्रह्मलोकसे पुनरागमनकी बात कही है, उससे यह नहीं समझना चाहिये कि वे फिर संसारबन्धनमें पड़ जाते हैं। उनका पुनरागमन भगवत्प्रेरणासे विश्वकी प्रवृत्तिका नियन्त्रण और संचालन करनेके लिये अथवा भगवान्की अवतार-लीलाओंके परिकररूपसे होता है। वे जन्म लेकर भी मुक्त ही रहते हैं। नारद, वसिष्ठ और अर्जुन आदि महात्मा एवं भगवत्पार्षद इसी कोटिमें कहे जा सकते हैं। इनका जन्म कर्मबन्धनसे नहीं होता, बल्कि भगवत्कार्यके संचालनके लिये होता है।