भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 1359, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 1359

ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ १३४३


| श्रीर्ह वा एषा पत्नी स्त्रीणां मध्ये यद्यस्मान्मलोद्वासा उद्गतमलवद्वासास्तस्मात्तां मलोद्वाससं यशस्विनीं श्रीमतीमभिक्रम्याभिगत्योपमन्त्रयेतेदमद्यावाभ्यां कार्यं यत् पुत्रोत्पादनमिति त्रिरात्रान्त आप्लुताम् ॥ ६ ॥ | [ जिसके गर्भसे पुत्रकी उत्पत्ति करनी हो उस पत्नीकी स्तुति इस प्रकार करे—] यह पत्नी सब स्त्रियोंमें लक्ष्मीस्वरूपा है, क्योंकि यह मलोद्वासा है, रजस्वला होनेके कारण इसके वस्त्रमें रजके चिह्न स्पष्ट दीखते हैं। अतः उस मलोद्वासा ( रजस्वला ), यशस्विनी श्रीमती पत्नीके पास, जब वह तीन रातके बाद स्नान करके शुद्ध हो गयी हो, जाकर उससे उपमन्त्रणा करे—कहे—'आज हम दोनोंको यह करना है, जिससे पुत्रकी उत्पत्ति हो' ॥ ६ ॥ |


सा चेदस्मै न दद्यात् काममेनामवक्रीणीयात् सा चेदस्मै नैव दद्यात् काममेनां यष्ट्या वा पाणिना वोपहत्यातिक्रामेदिन्द्रियेण ते यशसा यश आदद इत्ययशा एव भवति ॥ ७ ॥

वह पत्नी यदि इस पतिको मैथुन न करने दे तो पति उसे उसकी इच्छाके अनुसार वस्त्र, आभूषण आदि देकर उसके प्रति अपना प्रेम प्रकट करे । इतने पर भी यदि वह इसे मैथुनका अवसर न दे तो वह पति इच्छानुसार दण्डका भय दिखाकर उसके साथ बलपूर्वक समागम करे । यदि यह भी सम्भव न हो तो कहे 'मैं तुझे शाप देकर दुर्भगा ( वन्ध्या ) बना दूँगा।' ऐसा कहकर वह उसके निकट जाय और 'मैं अपनी यशःस्वरूप इन्द्रियद्वारा तेरे यशको छीने लेता हूँ।' इस मन्त्रका उच्चारण करे । इस प्रकार शाप देनेपर वह अयशस्विनी ( वन्ध्या अथवा दुर्भगा ) हो ही जाती है ॥ ७ ॥