भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 1367, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 1367

ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ १३५१

जो पुरुष चाहता हो कि मेरा पुत्र शुक्ल वर्णका हो, एक वेदका अध्ययन करे और पूरे सौ वर्षोंकी आयुतक जीवित रहे, उस दशामें वे दोनों पति-पत्नी दूध और चावलको पकाकर खीर बना लें और उसमें घी मिलाकर खायें। इससे वे उपर्युक्त योग्यतावाले पुत्रको उत्पन्न करनेमें समर्थ होते हैं ॥ १४ ॥

स य इच्छेत् पुत्रो मे शुक्लो वर्णतो जायेत वेदमेकमनुब्रुवीत सर्वमायुरियाद् वर्षशतं क्षीरौदनं पाचयित्वा सर्पिष्मन्तमश्नीयातामीश्वरौ समर्थौ जनयितवै जनयितुम् ॥ १४ ॥जो पुरुष चाहता हो कि मेरा पुत्र शुक्ल वर्णका उत्पन्न हो, एक वेदका अध्ययन करे तथा पूरी आयु भर—सौ वर्षोंतक जीवित रहे तो वे दोनों पति-पत्नी दूध-चावलका खीर पकाकर उसमें घी डालकर खायें। इससे वे वैसे पुत्रको जन्म देनेमें समर्थ होते हैं ॥ १४ ॥

अथ य इच्छेत् पुत्रो मे कपिलः पिङ्गलो जायेत द्वौ वेदावनुब्रुवीत सर्वमायुरियादिति दध्योदनं पाचयित्वा सर्पिष्मन्तमश्नीयातामीश्वरौ जनयितवै ॥ १५॥

जो चाहे कि मेरा पुत्र कपिल या पिङ्गल वर्णका हो, दो वेदोंका अध्ययन करे और पूरे सौ वर्षोंतक जीवित रहे तो वह और उसकी पत्नी दहीके साथ भात पकाकर उसमें घी मिलाकर खायें। इससे वे वैसे पुत्रको जन्म देनेमें समर्थ होते हैं ॥ १५ ॥

दध्योदनं दध्ना चरुं पाचयित्वा द्विवेदं चेदिच्छति पुत्रं तदैवमशननियमः ॥ १५ ॥दध्योदन बनाकर—दहीके साथ चरु पकाकर (दोनों दम्पति भोजन करें) यदि द्विवेदी पुत्रको पानेकी इच्छा हो, तब ऐसे भोजनका नियम है ॥१५॥