बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
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( १३७४ )
| मन्त्रप्रतीकानि | अ० | ब्रा० | मं० | पृष्ठ |
|---|---|---|---|---|
| तस्यै वाचः पृथिवी | १ | ५ | ११ | ३५२ |
| तं् हैतमुद्दालक | ६ | ३ | ७ | १३३० |
| तान् होवाच ब्राह्मणा | ३ | १ | २ | ६२२ |
| ता वा अस्यैता हिता | ४ | ३ | २० | ६६२ |
| ताँ् हैतामेके | ५ | १४ | ५ | १२३२ |
| ते देवा अब्रुवन्नेतावद्वा | १ | ३ | १८ | १३४ |
| ते य एवमेतद्विदु० | ६ | २ | १५ | १३०२ |
| ते ह वाचमूचुस्त्वं न | १ | ३ | २ | १०७ |
| ते हेमे प्राण अहँ् श्रेयसे | ६ | १ | ७ | १२५५ |
| ते होचुः क्व नु सोऽभूत् | १ | ३ | ८ | ११९ |
| त्रयं वा इदं नाम रूपं | १ | ६ | १ | ३६२ |
| त्रयाः प्राजापत्याः | ५ | २ | १ | ११८१ |
| त्रयो लोका एत एव | १ | ५ | ४ | ३४८ |
| त्रयो वेदा एत एव | १ | ५ | ५ | ३४८ |
| त्रीण्यात्मनेऽकुरुतेति | १ | ५ | ३ | ३४२ |
| त्वग्वै ग्रहः | ३ | २ | ६ | ६५६ |
| त्वच एवास्य रुधिरं | ३ | ९ | २–२८ | ८२५ |
| दिवश्चैनमादित्याच्च | १ | ५ | १६ | ३७७ |
| दृप्तबालाकिर्हानूचानो | २ | १ | १ | ४०४ |
| देवाः पितरो मनुष्या | १ | ५ | ६ | ३४८ |
| द्वया ह प्राजापत्या | १ | ३ | १ | ८८ |
| द्वे वाव ब्रह्मणो रूपे मूर्तं | २ | ३ | १ | ५१३ |
| न तत्र रथा न रथ० | ४ | ३ | १० | ६३२ |
| नैवेह किंचनाग्र आसीत् | १ | २ | १ | ४८ |
| पर्जन्यो वा अग्निर्गौतम | ६ | २ | १० | १२६४ |
| पिता माता प्रजात | १ | ५ | ७ | ३४८ |
| पुरुषो वा अग्निर्गौतम | ६ | २ | १२ | १२६८ |
| पूर्णमदः पूर्णमिदं | ५ | १ | १ | ११६३ |
| पृथिव्येव यस्यायतन० | ३ | ९ | १० | ७६४ |
| पृथिव्यै चैनमग्नेश्च | १ | ५ | १८ | ३७६ |
| प्राणस्य प्राणमुत चक्षुष० | ४ | ४ | १८ | १०८७ |
| प्राणेन रक्षन्नवरं कुलायं | ४ | ३ | १२ | ६३६ |
| प्राणोऽपानो व्यान | ५ | १४ | ३ | १२२५ |
| प्राणो वै ग्रहः | ३ | २ | २ | ६५५ |
| ब्रह्म तं...भूतानि | २ | ४ | ६ | ५५२ |