बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
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( १३७५ )
| मन्त्रप्रतीकानि | अ० | ब्रा० | मं० | पृष्ठ |
|---|---|---|---|---|
| ब्रह्म तं...वेदास्तं ... | ४ | ५ | ७ | ११३४ |
| ब्रह्म वा इदमग्र आसीत्तदात्मानमेवावेत् | १ | ४ | १० | २४३ |
| ब्रह्म...आसीदेकमेव ... | १ | ४ | ११ | २८६ |
| भूमिरन्तरिक्षं ... | ५ | १४ | १ | १०२३ |
| मनसैवानुद्रष्टव्यं ... | ४ | ४ | १६ | १०८८ |
| मनोमयोऽयं पुरुषो ... | ५ | ६ | १ | १२०२ |
| मनो वै ग्रहः ... | ३ | २ | ७ | ६५६ |
| मनो होच्चक्राम ... | ६ | १ | ११ | १२५८ |
| मांसान्यस्य शर्कराणि ... | ३ | ९ | ३-२८ | ८२६ |
| मैत्रेयीति होवाच याज्ञवल्क्यः ... | ४ | ५ | २ | ११२६ |
| मैत्रेयीति होवाच याज्ञवल्क्य ... | २ | ४ | १ | ५४४ |
| यः पृथिव्यां तिष्ठन् ... | ३ | ७ | ३ | ७४६ |
| यः प्राणे तिष्ठन् ... | ३ | ७ | १६ | ७५४ |
| यः श्रोत्रे तिष्ठ० ... | ३ | ७ | १६ | ७५४ |
| यः सर्वेषु भूतेषु ... | ३ | ७ | १५ | ७५३ |
| य आकाशे तिष्ठन् ... | ३ | ७ | १२ | ७५१ |
| य आदित्ये तिष्ठन् ... | ३ | ७ | ९ | ७५१ |
| य एष एतस्मिन्मण्डले ... | ५ | ५ | ३ | १२०० |
| यजुः प्राणो वै यजुः प्राणे ... | ५ | १३ | २ | १२१६ |
| यत्किञ्च विजिज्ञास्यं ... | १ | ५ | ९ | ३५० |
| यत्किञ्चाविज्ञातं प्राणस्य ... | १ | ५ | १० | ३५० |
| यत्ते कश्चिदब्रवीत्तच्छृण० ... | ४ | १ | २ | ८४२ |
| यत्र वा अन्यदिव ... | ४ | ३ | ३१ | ९६६ |
| यत्र हि द्वैतमिव भवति तदितर इतरं जिघ्रति | २ | ४ | १४ | ५७५ |
| यत्र...पश्यति ... | ४ | ५ | १५ | ११४१ |
| यत्सप्तान्नानि मेधया तपसाजनयत्पिता | १ | ५ | १ | ३२१ |
| यत्सप्तान्नानि...पितेति ... | १ | ५ | २ | ३२३ |
| यत्तन्मूलमावृहेयु० ... | ३ | ९ | ६-२८ | ८२६ |
| यथा वृक्षो वनस्पति० ... | ३ | ९ | १-२८ | ८२४ |
| यदा वै पुरुषो० ... | ५ | १० | १ | १२०६ |
| यदेव ते कश्चिदब्रवीत्तच्छृणवामेत्य-<br>ब्रवीन्म उदङ्कः ... | ४ | १ | ३ | ८४७ |
| यदेव ते गर्दभीविपीतो ... | ४ | १ | ५ | ८५१ |
| यदेव ते...बर्कुर्वार्ष्ण० ... | ४ | १ | ४ | ८४६ |
| यदेव ते...विदग्धः ... | ४ | १ | ७ | ८५५ |